+ साम्परायिक आस्रव के भेद -
इन्द्रिय-कषायाव्रत-क्रिया: पंच-चतु:-पंच-पंचविंशति-संख्या: पूर्वस्य भेदा: ॥5॥
अन्वयार्थ : पूर्व के अर्थात् साम्परायिक कर्मास्रव के इन्द्रिय, कषाय, अव्रत और क्रियारूप भेद हैं जो क्रम से पाँच, चार, पाँच और पच्चीस हैं ॥५॥
Meaning : The subdivisions of the former are the five senses, the four passions, non-observance of the five vows and twenty-five activities.

  सर्वार्थसिद्धि    राजवार्तिक 

सर्वार्थसिद्धि :

यहाँ इन्द्रिय आदि का पाँच आदि के साथ क्रम से सम्बन्ध जानना चाहिए । यथा इन्द्रियाँ पाँच हैं, कषाय चार हैं, अव्रत पाँच हैं और क्रिया पच्चीस हैं । इनमें-से स्पर्शन आदि पाँच इन्द्रियों का कथन पहले कर आये हैं । क्रोधादि चार कषाय हैं और हिंसा आदि पाँच अव्रत आगे कहेंगे । पच्चीस क्रियाओं का वर्णन यहाँ करते हैं --
  1. चैत्य, गुरु और शास्त्र की पूजा आदिरूप सम्यक्त्व को बढ़ाने वाली सम्यक्त्व क्रिया है ।
  2. मिथ्यात्व के उदय से जो अन्य देवता के स्त‍वन आदि रूप क्रिया होती है वह मिथ्यात्व क्रिया है।
  3. शरीर आदि द्वारा गमनागमन आदिरूप प्रवृत्ति प्रयोगक्रिया है।
  4. संयत का अविरति के सम्मु्ख होना समादान क्रिया है ।
  5. ईर्यापथ की कारणभूत क्रिया ईर्यापथ क्रिया है। ये पाँच क्रिया है ।
  6. क्रोध के आवेश से प्रादोषिकी क्रिया होती है ।
  7. दुष्ट भाव युक्त होकर उद्यम करना कायिकी क्रिया है ।
  8. हिंसा के साधनों को ग्रहण करना आधिकरणिकी क्रिया है ।
  9. जो दु:ख की उत्पत्ति का कारण है वह पारितापिकी क्रिया है ।
  10. आयु, इन्द्रिय, बल और श्वासोच्छ्‍वास रूप प्राणों का वियोग करने वाली प्राणातिपातिकी क्रिया है । ये पाँच क्रिया हैं ।
  11. रागवश स्नेहसिक्त होने के कारण प्रमादी का रमणीय रूप के देखने का अभिप्राय दर्शनक्रिया है ।
  12. प्रमादवश स्पर्श करने लायक सचेतन पदार्थ का अनुबन्ध स्पर्शन क्रिया है ।
  13. नये अधिकरणों को उत्पन्न करना प्रात्ययिकी क्रिया है ।
  14. स्त्री, पुरुष और पशुओं के जाने, आने, उठने और बैठने के स्थान में भीतरी मल का त्याग करना समन्तानुपात क्रिया है ।
  15. प्रमार्जन और अवलोकन नहीं की गयी भूमि पर शरीर आदि का रखना अनाभोग क्रिया है। ये पाँच क्रिया हैं ।
  16. जो क्रिया दूसरों द्वारा करने की हो उसे स्वयं कर लेना स्वहस्त क्रिया है ।
  17. पापादान आदिरूप प्रवृत्ति विशेष के लिए सम्मति देना निसर्ग क्रिया है ।
  18. दूसरे ने जो सावद्यकार्य किया हो उसे प्रकाशित करना विदारणक्रिया है ।
  19. चारित्रमोहनीय के उदय से आवश्यक आदि के विषय में शास्त्रोक्त आज्ञा को न पाल सकने के कारण अन्यथा निरूपण करना आज्ञाव्यापादिकी क्रिया है ।
  20. धूर्तता और आलस्य के कारण शास्त्र में उपदेशी गयी विधि करने का अनादर अनाकांक्षक्रिया है। ये पाँच क्रिया हैं ।
  21. छेदना, भेदना और मारना आदि क्रिया में स्वयं तत्पर रहना और दूसरे के करने पर हर्षित होना प्रारम्भ क्रिया है ।
  22. परिग्रह का नाश न हो इसलिए जो क्रिया की जाती है वह पारिग्राहिकी क्रिया है ।
  23. ज्ञान, दर्शन आदि के विषय में छल करना मायाक्रिया है ।
  24. मिथ्यादर्शन के साधनों से युक्त पुरुष की प्रशंसा आदि के द्वारा दृढ़ करना कि 'तू ठीक करता है' मिथ्या दर्शन क्रिया है ।
  25. संयम का घात करने वाले कर्म के उदय से त्यागरूप परिणामों का न होना अप्रत्याख्यान क्रिया है । ये पाँच क्रिया हैं ।
ये सब मिलकर पच्चीस क्रियाएँ होती हैं । कार्य-कारण के भेद से अलग-अलग भेद को प्राप्त होकर ये इन्द्रियादिक साम्परायिक कर्म के आस्रव के द्वार हैं ।

शंका – तीनों योग सब आत्माओं के कार्य हैं, इसलिए वे सब संसारी जीवों के समान रूप से प्राप्त होते हैं इसलिए कर्मबन्ध के फल के अनुभव के प्रति समानता प्राप्त होनी चाहिए ?

समाधान –
यह बात ऐसी नहीं है, क्योंकि यद्यपि योग प्रत्येक आत्मा के होता है, परन्तु जीवों के परिणामों के अनन्त भेद हैं, इसलिए कर्मबन्ध के फल के अनुभव की विशेषता माननी पड़ती है।

शंका – किस प्रकार ?

समाधान –
अब अगले सूत्र द्वारा इसी बात का समाधान करते हैं --
राजवार्तिक :

1-5. इन्द्रिय आदि में इतरेतरयोग द्वन्द्व समास है। पंच आदि का संख्या शब्द से समास करके उनका यथाक्रम अन्धय कर देना चाहिए। पूर्व अर्थात् पहिले सूत्र में जिसका प्रथम निर्देश किया है । भेद अर्थात् प्रकार। पाँच इन्द्रियाँ, चार कषाय, पाँच अव्रत और पच्चीस क्रियाएँ ये पूर्वसाम्परायिक आस्रव के भेद हैं।

6. इन्द्रियादि का आत्मा से कथश्चित् भेद और कथञ्चित् अभेद है।
  • अनादि पारिणामिक चैतन्य द्रव्यार्थादेश से इन्द्रियादि का अभेद है और
  • कर्मोदय-क्षयोपशमनिमित्तक पर्यायार्थादेश से भिन्नता है ।
इन्द्रियादि की निवृत्ति होने पर भी द्रव्य स्थिर रहता है। इसीलिए पर्यायभेद से पाँच आदि भेद बन जाते हैं । स्पर्शादि पाँच इन्द्रियों का वर्णन कर चुके हैं क्रोधादिकषाय और हिंसादि अव्रत का वर्णन आगे करेंगे । पच्चीस क्रियाएँ इस प्रकार हैं

7-11.
  1. चैत्य गुरु शास्त्र की पूजा आदि सम्यक्त्व को बढ़ानेवाली क्रिया सम्यक्त्वक्रिया है ।
  2. अन्यदेवता का स्तवन आदि मिथ्यात्वहेतु प्रवृत्ति मिथ्यात्व क्रिया है।
  3. शरीर आदि के द्वारा गमन आगमन आदि प्रवृत्ति करना प्रयोग क्रिया है। अथवा वीर्यान्तराय ज्ञानावरण का क्षयोपशम होनेपर अंगोपांग नाम कर्म के उदय से काय वचन और मनोयोग की रचना में समर्थ पुद्गलों का ग्रहण करना प्रयोग क्रिया है ।
  4. संयम धारण करनेपर भी अविरति की तरफ झुकना समादान क्रिया है
  5. ईर्यापथ-आस्रव में कारणभूत क्रिया ईर्यापथ क्रिया है ।
  6. क्रोधावेश से प्रवृत्ति प्रादोषिकी क्रिया है । क्रोध प्रदोष में कारण होता है अतः कार्यकारण के भेद से क्रोधकषाय और प्रादोषिकी क्रिया में भेद है। क्रोध अनिमित्त भी होता है पर प्रदोष क्रोधरूप निमित्त से होता है। पिशुन स्वभाववाला व्यक्ति इष्ट दारा हरण, धननाश आदि निमित्तों के बिना स्वभाव से ही क्रोध करता है। किसी-किसी की दृष्टि में ही विष होता है। कहा भी है - "जिस प्रकार पूर्णिमा के दिन चन्द्र का बिना किसी निमित्त के स्वभाव से ही उदय होता है उसी तरह कर्मवशी आत्मा के बिना निमित्त के ही क्रोधादि कषायों का उदय होता है ।" तथा "दुर्जन पुरुषों की चेष्टाएँ, जिनकी लोल जिह्वा मृगों के खून से लाल हो रही है ऐसे शार्दूल, भेड़िया, सर्प आदि निसर्ग हिंसक प्राणियों के समान वैर और रोषपूर्ण होती हैं।"
  7. प्रदोष के बाद प्रयत्न करना कायिकी क्रिया है ।
  8. हिंसा के उपकरणों को ग्रहण करना आधिकरणकी क्रिया है ।
  9. दूसरे को दुःख उत्पन्न करनेवाली पारितापिकी क्रिया है।
  10. आयु, इन्द्रिय बल आदि का वियोग करनेवाली प्राणातिपातिकी क्रिया है ।
  11. रागाविष्ट होकर प्रमादी पुरुष का रमणीय रूप के देखने की ओर प्रवृत्ति दर्शनक्रिया है ।
  12. प्रमादवश छूने की प्रवृत्ति स्पर्शन क्रिया है ।
  13. चक्षु इन्द्रिय और स्पर्शन इन्द्रियों में इन इन्द्रियों द्वारा होने वाले ज्ञान का ग्रहण है तथा यहाँ ज्ञानपूर्वक हलन-चलन का ग्रहण है। नये-नये अधिकरणों को उत्पन्न करना प्रात्यायिकी क्रिया है ।
  14. स्त्री-पुरुष, पशु आदि से व्याप्त स्थान में मलोत्सर्ग करना समन्तानुपातन किया है ।
  15. बिना शोधी और बिना देखी भूमि पर शरीर आदि का रखना अनाभोग क्रिया है
  16. दूसरे के द्वारा करने योग्य क्रिया को स्वयं करना स्वहस्त किया है ।
  17. पापादान आदि को स्वीकार करना निसर्ग क्रिया है ।
  18. आलस्य से प्रशस्त क्रियाओं का न करना और पर के पाप आदि का प्रकाशन करना विदारण क्रिया है ।
  19. चारित्रमोह के उदय से आवश्यक आदि क्रियाओं के करने में असमर्थ होने पर शास्त्राज्ञा का अन्यथा ही निरूपण करना आज्ञाव्यापादिका क्रिया है ।
  20. मूर्खता और आलस्य से शास्त्रोपदिष्ट विधि-विधानों के प्रति अनादर करना अनाकांक्षा क्रिया है ।
  21. छेदनभेदन, हिंसा आदि क्रियाओं में तत्पर होना अथवा अन्य के द्वारा हिंसादि व्यापार किये जाने पर हर्षित होना आरम्भ क्रिया है ।
  22. परिग्रह के नष्ट न होने देने के लिए जो व्यापार है वह पारिग्राहिकी क्रिया है ।
  23. ज्ञान-दर्शन आदि में छल-कपट करना माया क्रिया है ।
  24. मिथ्यात्व के कार्यो की प्रशंसा कर के दूसरे को मिथ्यात्व में दृढ़ करना मिथ्यादर्शन क्रिया है ।
  25. संयमघाती कर्म के उदय से विषयों का प्रत्याख्यान-त्याग नहीं करना अप्रत्याख्यान क्रिया है ।


12. प्रश्न – इन्द्रिय, कषाय और अव्रत भी क्रिया स्वभाव ही हैं अतः उनका पृथक ग्रहण करना निरर्थक है ?

उत्तर –
यह एकान्त नियम नहीं है कि इन्द्रिय, कषाय और अव्रत क्रिया स्वभाव ही हों। नाम, स्थापना और द्रव्यरूप इन्द्रिय, कषाय और अव्रतों में परिस्पन्दात्मक क्रियारूपता नहीं है । नामेन्द्रिय आदि तो शब्दमात्र हैं, अतः इसमें तो क्रियारूपता है नहीं । स्थापना इन्दिय आदि 'यह वही है। इस प्रकार के शब्द और विज्ञान में कारण होते है, अतः इनमें भी क्रियारूपता नहीं कही जा सकती। द्रव्यरूप इन्द्रियादि में तो चाहे वह अतीत रूप हो या भावियोग्यता रूप, वर्तमान इन्द्रियादिरूपता है नहीं अतः उसमें परिस्पन्दात्मक क्रियारूपता नहीं हो सकती। अथवा, यह कोई नियम नहीं है कि इन्द्रिय, कषाय आदि क्रियारूप ही हों। द्रव्यार्थिक को गौण करनेपर पर्यायार्थिक की प्रधानता में इन्द्रिय, कषाय और अव्रत को कथंचित् क्रियारूप कह सकते हैं पर पर्यायार्थिक को गौण और द्रव्यार्थिक को मुख्य करनेपर क्रियारूपता नहीं भी है।

13-14 'इन्द्रिय कषाय और अव्रत शुभ और अशुभ आस्रव परिणाम के अभिमुख होने से द्रव्यास्रव हैं। कर्म का ग्रहण भावास्रव है। वह पच्चीस क्रियाओं के द्वारा होता है। इसलिए इन्द्रिय, कषाय और अव्रत का ग्रहण किया है' यह समाधान उचित नहीं है, क्योंकि इस से प्रतिज्ञाविरोध होता है। 'कायवाङमनःकर्म योगः, स आस्रवः' इन सूत्रों से द्रव्यास्रव का ही निरूपण किया गया है।

15. निमित्तनैमित्तिक-भाव ज्ञापन करने के लिए इन्द्रिय आदि का पृथक् ग्रहण किया है। छूना आदि क्रोध करना आदि और हिंसा करना आदि क्रियाएँ आस्रव हैं। ये पञ्चीस क्रियाएँ इन्हीं से उत्पन्न होती हैं। इनमें तीन परिणमन होते हैं। जैसे मूर्छा-ममत्व परिणाम कारण है, परिग्रह कार्य है। इनके होनेपर पारिग्राहिकी क्रिया भिन्न ही होती है जो कि परिग्रह के संरक्षण अविनाश और संस्कारादि रूप हैं । क्रोध कारण है प्रदोष कार्य है इनसे प्रादोषिकी क्रिया होती है। मान कारण है, नम्र न होना कार्य है, इनसे अपूर्वाधिकरण उत्पन्न करनेवाली प्रात्यायिकी क्रिया भिन्न है । माया कारण है, कुटिलता कार्य है, इनसे ज्ञानदर्शन और चारित्रमें माया प्रवृत्ति रूप क्रिया होती है। प्राणातिपात कारण है और प्राणातिपातिकी क्रिया कार्य है । मृषावाद चोरी और कुशील कारण है और असंयम के उदय से आज्ञाव्यापादि का क्रिया कार्य है। इसी तरह अन्य भी समझना चाहिए।

16. प्रश्न – इन्द्रियों से ही ज्ञान करके और विचार के बाद कषाय, अव्रत और क्रियाओं में प्रवृत्ति होती है अतः इन्द्रिय का ही ग्रहण करना चाहिए । कषाय, अव्रत और क्रियाएँ तो अर्थात् ही गृहीत हो जाती हैं, उनका ग्रहण नहीं करना चाहिए। इससे सूत्र भी लघु हो जायगा ?

उत्तर –
यदि इन्द्रियों को ही आस्रव में गिना जाय तो छठवें गुणस्थान तक ही आस्रव का विधान होगा अप्रमत्त के नहीं। प्रमत्त ही चक्षु आदि इन्द्रियों से रूपादिक विषयों के सेवन के प्रति आसक्त होता है। या सेवन न भी करे तो भी हिंसादि की कारणभूत अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ रूप आठ कषायों से युक्त होता हुआ हिंसादि करता है, न भी करे तो भी प्रमादी होने से सतत कर्मों का आस्रव करता है । परन्तु अप्रमत्त व्यक्ति पन्द्रह प्रकार के प्रमादों से रहित होकर मात्र योग और कषायनिमित्तक ही आस्रव करता है। एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञिपंचेन्द्रियों में यथासम्भव चक्षु आदि इन्द्रियाँ और मनोविचार के न होने पर भी क्रोधादि-हिंसा पूर्वक कर्मग्रहण होता ही है। अतः सर्वसंग्रह के लिए कषाय आदि का ग्रहण करना उचित है।

17. प्रश्न – राग-द्वेष से रहित व्यक्ति न तो इन्द्रियों से विषय ग्रहण करता है और न जीवहिंसा या असत्य आदि में प्रवृत्ति करता है, अतः कषाय के ग्रहण करने से सभी साम्परायिक आस्रवों का ग्रहण हो ही जाता है, इन्द्रिय अव्रत और क्रियाओं का ग्रहण नहीं करना चाहिए ?

उत्तर –
उपशान्तकषायी साधु के कषाय का सद्भाव रहने मात्र से चक्षुरादि के द्वारा रूपादि विषयों का ग्रहण करने के कारण राग-द्वेष और हिंसा आदि की उत्पत्ति का प्रसंग होगा । यदि रूपादि के ग्रहण करने मात्र से रागी-द्वेषीपना आता हो तो कोई वीतराग नहीं हो पायगा। चक्षु आदि के द्वारा रूपादि का ग्रहण होनेपर भी कोई व्यक्ति वीतराग रह सकता है । अतः कषाय मात्र का प्रहण करना ठीक नहीं है।

18. यद्यपि अव्रत में इन्द्रिय, कषाय और क्रियाएँ अन्तर्भूत हो सकती हैं किन्तु अव्रत की प्रवृत्ति में इन्द्रिय, कषाय और क्रियाएँ निमित्त हैं यह प्रवृत्ति-निमित्तता द्योतन करने के लिए इन्द्रिय, कषाय और क्रियाओं का पृथक् ग्रहण किया है।