
सर्वार्थसिद्धि :
यहाँ इन्द्रिय आदि का पाँच आदि के साथ क्रम से सम्बन्ध जानना चाहिए । यथा इन्द्रियाँ पाँच हैं, कषाय चार हैं, अव्रत पाँच हैं और क्रिया पच्चीस हैं । इनमें-से स्पर्शन आदि पाँच इन्द्रियों का कथन पहले कर आये हैं । क्रोधादि चार कषाय हैं और हिंसा आदि पाँच अव्रत आगे कहेंगे । पच्चीस क्रियाओं का वर्णन यहाँ करते हैं --
शंका – तीनों योग सब आत्माओं के कार्य हैं, इसलिए वे सब संसारी जीवों के समान रूप से प्राप्त होते हैं इसलिए कर्मबन्ध के फल के अनुभव के प्रति समानता प्राप्त होनी चाहिए ? समाधान – यह बात ऐसी नहीं है, क्योंकि यद्यपि योग प्रत्येक आत्मा के होता है, परन्तु जीवों के परिणामों के अनन्त भेद हैं, इसलिए कर्मबन्ध के फल के अनुभव की विशेषता माननी पड़ती है। शंका – किस प्रकार ? समाधान – अब अगले सूत्र द्वारा इसी बात का समाधान करते हैं -- |
राजवार्तिक :
1-5. इन्द्रिय आदि में इतरेतरयोग द्वन्द्व समास है। पंच आदि का संख्या शब्द से समास करके उनका यथाक्रम अन्धय कर देना चाहिए। पूर्व अर्थात् पहिले सूत्र में जिसका प्रथम निर्देश किया है । भेद अर्थात् प्रकार। पाँच इन्द्रियाँ, चार कषाय, पाँच अव्रत और पच्चीस क्रियाएँ ये पूर्वसाम्परायिक आस्रव के भेद हैं। 6. इन्द्रियादि का आत्मा से कथश्चित् भेद और कथञ्चित् अभेद है।
7-11.
12. प्रश्न – इन्द्रिय, कषाय और अव्रत भी क्रिया स्वभाव ही हैं अतः उनका पृथक ग्रहण करना निरर्थक है ? उत्तर – यह एकान्त नियम नहीं है कि इन्द्रिय, कषाय और अव्रत क्रिया स्वभाव ही हों। नाम, स्थापना और द्रव्यरूप इन्द्रिय, कषाय और अव्रतों में परिस्पन्दात्मक क्रियारूपता नहीं है । नामेन्द्रिय आदि तो शब्दमात्र हैं, अतः इसमें तो क्रियारूपता है नहीं । स्थापना इन्दिय आदि 'यह वही है। इस प्रकार के शब्द और विज्ञान में कारण होते है, अतः इनमें भी क्रियारूपता नहीं कही जा सकती। द्रव्यरूप इन्द्रियादि में तो चाहे वह अतीत रूप हो या भावियोग्यता रूप, वर्तमान इन्द्रियादिरूपता है नहीं अतः उसमें परिस्पन्दात्मक क्रियारूपता नहीं हो सकती। अथवा, यह कोई नियम नहीं है कि इन्द्रिय, कषाय आदि क्रियारूप ही हों। द्रव्यार्थिक को गौण करनेपर पर्यायार्थिक की प्रधानता में इन्द्रिय, कषाय और अव्रत को कथंचित् क्रियारूप कह सकते हैं पर पर्यायार्थिक को गौण और द्रव्यार्थिक को मुख्य करनेपर क्रियारूपता नहीं भी है। 13-14 'इन्द्रिय कषाय और अव्रत शुभ और अशुभ आस्रव परिणाम के अभिमुख होने से द्रव्यास्रव हैं। कर्म का ग्रहण भावास्रव है। वह पच्चीस क्रियाओं के द्वारा होता है। इसलिए इन्द्रिय, कषाय और अव्रत का ग्रहण किया है' यह समाधान उचित नहीं है, क्योंकि इस से प्रतिज्ञाविरोध होता है। 'कायवाङमनःकर्म योगः, स आस्रवः' इन सूत्रों से द्रव्यास्रव का ही निरूपण किया गया है। 15. निमित्तनैमित्तिक-भाव ज्ञापन करने के लिए इन्द्रिय आदि का पृथक् ग्रहण किया है। छूना आदि क्रोध करना आदि और हिंसा करना आदि क्रियाएँ आस्रव हैं। ये पञ्चीस क्रियाएँ इन्हीं से उत्पन्न होती हैं। इनमें तीन परिणमन होते हैं। जैसे मूर्छा-ममत्व परिणाम कारण है, परिग्रह कार्य है। इनके होनेपर पारिग्राहिकी क्रिया भिन्न ही होती है जो कि परिग्रह के संरक्षण अविनाश और संस्कारादि रूप हैं । क्रोध कारण है प्रदोष कार्य है इनसे प्रादोषिकी क्रिया होती है। मान कारण है, नम्र न होना कार्य है, इनसे अपूर्वाधिकरण उत्पन्न करनेवाली प्रात्यायिकी क्रिया भिन्न है । माया कारण है, कुटिलता कार्य है, इनसे ज्ञानदर्शन और चारित्रमें माया प्रवृत्ति रूप क्रिया होती है। प्राणातिपात कारण है और प्राणातिपातिकी क्रिया कार्य है । मृषावाद चोरी और कुशील कारण है और असंयम के उदय से आज्ञाव्यापादि का क्रिया कार्य है। इसी तरह अन्य भी समझना चाहिए। 16. प्रश्न – इन्द्रियों से ही ज्ञान करके और विचार के बाद कषाय, अव्रत और क्रियाओं में प्रवृत्ति होती है अतः इन्द्रिय का ही ग्रहण करना चाहिए । कषाय, अव्रत और क्रियाएँ तो अर्थात् ही गृहीत हो जाती हैं, उनका ग्रहण नहीं करना चाहिए। इससे सूत्र भी लघु हो जायगा ? उत्तर – यदि इन्द्रियों को ही आस्रव में गिना जाय तो छठवें गुणस्थान तक ही आस्रव का विधान होगा अप्रमत्त के नहीं। प्रमत्त ही चक्षु आदि इन्द्रियों से रूपादिक विषयों के सेवन के प्रति आसक्त होता है। या सेवन न भी करे तो भी हिंसादि की कारणभूत अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ रूप आठ कषायों से युक्त होता हुआ हिंसादि करता है, न भी करे तो भी प्रमादी होने से सतत कर्मों का आस्रव करता है । परन्तु अप्रमत्त व्यक्ति पन्द्रह प्रकार के प्रमादों से रहित होकर मात्र योग और कषायनिमित्तक ही आस्रव करता है। एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञिपंचेन्द्रियों में यथासम्भव चक्षु आदि इन्द्रियाँ और मनोविचार के न होने पर भी क्रोधादि-हिंसा पूर्वक कर्मग्रहण होता ही है। अतः सर्वसंग्रह के लिए कषाय आदि का ग्रहण करना उचित है। 17. प्रश्न – राग-द्वेष से रहित व्यक्ति न तो इन्द्रियों से विषय ग्रहण करता है और न जीवहिंसा या असत्य आदि में प्रवृत्ति करता है, अतः कषाय के ग्रहण करने से सभी साम्परायिक आस्रवों का ग्रहण हो ही जाता है, इन्द्रिय अव्रत और क्रियाओं का ग्रहण नहीं करना चाहिए ? उत्तर – उपशान्तकषायी साधु के कषाय का सद्भाव रहने मात्र से चक्षुरादि के द्वारा रूपादि विषयों का ग्रहण करने के कारण राग-द्वेष और हिंसा आदि की उत्पत्ति का प्रसंग होगा । यदि रूपादि के ग्रहण करने मात्र से रागी-द्वेषीपना आता हो तो कोई वीतराग नहीं हो पायगा। चक्षु आदि के द्वारा रूपादि का ग्रहण होनेपर भी कोई व्यक्ति वीतराग रह सकता है । अतः कषाय मात्र का प्रहण करना ठीक नहीं है। 18. यद्यपि अव्रत में इन्द्रिय, कषाय और क्रियाएँ अन्तर्भूत हो सकती हैं किन्तु अव्रत की प्रवृत्ति में इन्द्रिय, कषाय और क्रियाएँ निमित्त हैं यह प्रवृत्ति-निमित्तता द्योतन करने के लिए इन्द्रिय, कषाय और क्रियाओं का पृथक् ग्रहण किया है। |