
सर्वार्थसिद्धि :
'दानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च' इस सूत्र की व्याख्या करते समय दानादिक का व्याख्यान कर आये हैं । उनका नाश करना विघ्न है । और इस विघ्न का करना अन्तराय कर्म का आस्रव जानना चाहिए । शंका – तत्प्रदोष और निह्नव आदिक ज्ञानावरण और दर्शनावरण आदि कर्मों के प्रतिनियत आस्रव के कारण कहे तो क्या वे ज्ञानावरण और दर्शनावरण आदि प्रतिनियत कर्मों के आस्रव के कारण हैं या सामान्य से सभी कर्मों के आस्रव के कारण हैं ? यदि ज्ञानावरणादिक प्रतिनियत कर्मों के कारण हैं तो आगम से विरोध प्राप्त होता है, क्योंकि आयु के सिवा शेष सात कर्मों का प्रति समय आस्रव होता है ऐसा आगम में कहा है, अतः इससे विरोध होता है । और यदि सामान्य से सब कर्मों के आस्रव के कारण हैं ऐसा माना जाता है तो इस प्रकार विशेष रूप से कथन करना युक्त नहीं ठहरता ? समाधान – यद्यपि तत्प्रदोष आदि से ज्ञानावरणादि सब कर्म प्रकृतियों का प्रदेश बन्ध होता है ऐसा नियम नहीं है तो भी वे प्रतिनियत अनुभागबन्ध के हेतु हैं, इसलिए तत्प्रदोष, निह्नव आदि का अलग-अलग कथन किया है । इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां षष्ठोध्यायः ।।6।। इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्ति में छठा अध्याय समाप्त हुआ ।।6।। |
राजवार्तिक :
1. दान लाभ भोग उपभोग और वीर्य में विघात करना-विघ्न उपस्थित करना अन्तराय के आस्रव के कारण है। ज्ञानप्रतिषेध, सत्कारोपघात, दान-लाभ-भोग-उपभोग-वीर्य स्नान-अनलेपन, गन्ध-माल्य, आच्छादन भूषण, शयन, आसन, भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य और परिभोग आदि में विघ्न करना, विभवस्मृद्धि में विस्मय करना, द्रव्य का त्याग नहीं करना, द्रव्य के उपयोग के समर्थन में प्रमाद करना, देवता के लिए निवेदित किया या अनिवेदित किये गये द्रव्य का ग्रहण, निर्दोष उपकरणों का त्याग, दूसरे की शक्ति का अपहरण, धर्म-व्यवच्छेद करना, कुशल चारित्रवाले तपस्वी गुरु तथा चैत्य की पूजा में व्याघात करना, दीक्षित कृपण दीन अनाथ को दिये जानेवाले वस्त्र-पात्र, आश्रय आदि में विघ्न करना, पर-निरोध, बन्धन, गुह्य अंगच्छेद, कान-नाक-ओंठ आदि का काट देना प्राणिवध आदि अन्तरायकर्म के आस्रव के कारण हैं। 2. 'शान्तिः शौचमिति' सूत्र से प्रकारवाची 'इति' शब्द का सब जगह अनुवर्तन करना चाहिए। इससे अनुक्त प्रकारों का संग्रह हो जाता है। 3. जैसे शराबी मद-मोह-विभ्रमकरी सुरा को पीकर उस के नशे में अनेक विकारों को प्राप्त होता है अथवा जैसे रोगी अपथ्य भोजन कर के अनेक बात-पित्तादि विकारों से ग्रस्त होता है उसी तरह उक्त आस्रवविधि से ग्रहण किये गये ज्ञानावरणादि आठ कर्मों से यह आत्मा अनेक संसार-विकारों को प्राप्त होता है। 4-6. जैसे दीपक घटादि का प्रकाशक होता है उसी तरह शास्त्र भी पदार्थों का प्रकाशक होता है । 'यह परिणमन या शक्ति अमुक फल को उत्पन्न करेगी' यह तो स्वभावव्याख्यान है। शास्त्र भी अतिशयज्ञानवाले युगपत् सर्वार्थावभासनसमर्थ प्रत्यक्षज्ञानी केवली के द्वारा प्रणीत हैं, अतः प्रमाण हैं । इसीलिए शास्त्र में वर्णित ज्ञानावरणादि के आस्रव के कारण आगमानुगृहीत हैं और ग्राह्य हैं । शास्त्र भी स्वभाव को ही प्रकट करता है। 'शास्त्रसिद्ध भी पदार्थव्यवस्था होती है' इसमें किसी भी वादी को विवाद नहीं है। वैशेषिक पृथिव्यादि द्रव्यों का कठिन द्रव, उष्ण और चलनस्वभाव, रूपादिगुणों को उन-उन इन्द्रियों के द्वारा गृहीत होने का स्वभाव और उत्क्षेपण-अवक्षेपण आदि का संयोग और विभाग से निरपेक्षकारण होने का स्वभाव आगम से ही स्वीकार करते हैं । सांख्य सत्त्व रज और तमगुणों का प्रकाश प्रवृत्ति आदि स्वभाव मानते हैं। बौद्ध अविद्या आदि का संस्कार आदि को उत्पन्न करने का प्रतिनियत स्वभाव स्वीकार करते हैं। अतः कोई उपालम्भ नहीं है। 7. प्रश्न – आगम में ज्ञानावरण के बन्धकाल में दर्शनावरण आदि का भी बन्ध बताया है, अतः प्रदोष आदि ज्ञानावरण के ही आस्रव के कारण नहीं हो सकते, सभी कर्मों के आस्रव के कारण होंगे ? उत्तर – प्रदोष आदि कारणों से ज्ञानावरण आदि उन कर्मों में विशेष अनुभाग पड़ता है । प्रदोष आदि से प्रदेशबन्ध तो सबका होता है पर अनुभाग उन्हीं-उन्हीं ज्ञानावरणादि में पड़ता है। अतः अनुभागविशेष से प्रदोष आदि का आस्रवभेद हो जाता है। *** छठाँ अध्याय समाप्त ***
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