+ प्रायश्चित्त के प्रकार -
आलोचना-प्रतिक्रमण-तदुभय-विवेक-व्युत्सर्ग-तपश्छेदपरिहारो-पस्थापना: ॥22॥
अन्वयार्थ : आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार और उपस्था‍पना यह नव प्रकार का प्रायश्चित्त है ॥२२॥
Meaning : Confession, repentance, both, discrimination, giving up attachment to the body, penance, suspension, expulsion, and reinitiation.

  सर्वार्थसिद्धि    राजवार्तिक 

सर्वार्थसिद्धि :

गुरू के समक्ष दश दोषों को टालकर अपने प्रमाद का निवेदन करना आलोचना है।

'मेरा दोष मिथ्या हो' गुरू से ऐसा निवेदन करके अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना प्रतिक्रमण है।

आलोचना और प्रतिक्रमण इन दोनों का संसर्ग होने पर दोषों का शोधन होने से तदुभय प्रायश्चित्त है।

संसक्त‍ हुए अन्न, पान और उपकरण आदि का विभाग करना विवेक प्रायश्चित्त है।

कायोत्सर्ग आदि करना व्युत्सर्ग प्रायश्चित्त है।

अनशन, अवमौदर्य आदि करना तप प्रायश्चित्त है।

दिवस, पक्ष और महीना आदि की प्रव्रज्या का छेद करना छेद प्रायश्चित्त है।

पक्ष, महीना आदि के विभाग से संघ से दूर रखकर त्याग करना परिहार प्रायश्चित्त है।

पुन: दीक्षा का प्राप्त करना उपस्थापना प्रायश्चित्त है।

विनय के भेदों का ज्ञान कराने के लिये आगे का सूत्र कहते हैं :-
राजवार्तिक :

1. प्रायः साधुलोक, जिस क्रिया में साधुओं का चित्त हो वह प्रायश्चित्त । अथवा, प्रायअपराध, उसका शोधन जिससे हो वह प्रायश्चित्त । प्रमाद, दोष, व्युदास, भावप्रसाद, निःशल्यत्व, अव्यवस्थानिवारण, मर्यादा का पालन, संयम की दृढ़ता, आराधना सिद्धि आदि के लिए प्रायश्चित्त से विशुद्ध होना आवश्यक है।

2. एकान्त में विराजमान प्रसन्नचित्त गुरु के समक्ष देशकालज्ञ शिष्य के द्वारा सविनय आत्मदोषों का निवेदन करना आलोचन है। आलोचना दस दोष रहित करनी चाहिये। वे दोष ये हैं -
  • उपकरण देने से मुझे लघु प्रायश्चित्त देगें इस विचार से प्रायश्चित्त के समय उपकरण आदि देना पहिला दोष है।
  • 'मैं दुर्बल हूँ रोगी हूँ उपवास आदि नहीं कर सकता' यदि प्रायश्चित्त दें तो दोष कहूँ' यह कहकर दोष कहना दूसरा दोष है।
  • दूसरों के द्वारा जाने गये दोषों का कहना तथा अज्ञात दोषों को छिपा लेना मायाचार नामक तीसरा दोष है।
  • आलस्य या प्रमाद से सूक्ष्म अपराधों की परवाह न करके स्थूल दोषों का कहना चौथा दोष है ।
  • कठिन प्रायश्चित्त के भय से बड़े दोषों को छिपाकर अल्प-दोषों को कहना पाँचवां दोष है।
  • 'ऐसा दोष होने पर क्या प्रायश्चित्त होगा' इस तरह तरकीब से प्रायश्चित्त जानकर चापलूसी से दोष कहना छठवाँ दोष है।
  • पाक्षिक, चातुर्मासिक या सांवत्सरिक प्रतिक्रमण के समय बहुत साधुओं की भीड़ में कोलाहल में दोष कहना सातवाँ दोष है ।
  • 'गुरु के द्वारा दिया गया प्रायश्चित्त युक्त है या नहीं? आगमविहित है या नहीं ?' इस प्रकार अन्य साधुओं से पूछना आठवाँ दोष है।
  • जिस किसी उद्देश्य से अपने में रागशील साधु के समक्ष दोष निवेदन करना नवाँ दोष है।
  • 'इसमें दिया गया कठोर प्रायश्चित्त भी विफल होता है, इसी के समान मेरा भी अपराध समान है, उसको यही जानता है, जो इसे प्रायश्चित्त दिया गया वही मैं शीघ्र ले लूँगा' -- इस प्रकार अपने दोष का संवरण करना दसवाँ दोष है।
अपने मन में दोषों को अधिक समय तक न रखकर निष्कपट वृत्ति से बालक की तरह सरलतापूर्वक दोष निवेदन करने में न तो ये दोष होते हैं और न अन्य ही। साधु का आलोचन तो एकान्त में आलोचक और आचार्य इन दो की उपस्थितिमें हो जाता है पर आर्यिका का आलोचन खुले सार्वजनिक स्थान में तीन व्यक्तियों की उपस्थिति में होता है। लज्जा और परतिरस्कार आदि के कारण दोषों का निवेदन करके भी यदि उनका शोधन नहीं किया जाता है तो अपनी आमदनी और खर्च का हिसाब न रखनेवाले कर्जदार की तरह दुःख का पात्र होना पड़ता है। बड़ी भारी दुष्कर तपस्याएँ भी आलोचना के बिना उसी तरह इष्टफल नहीं दे सकतीं जिस प्रकार विरेचन से शरीर की मलशुद्धि किये बिना खाई गई औषधि । आलोचन करके भी यदि गुरु के द्वारा दिये गये प्रायश्चित्त का अनुष्ठान नहीं किया जाता है तो वह बिना संवारे धान्य की तरह महाफलदायक नहीं हो सकता। आलोचनायुक्त चित्त से किया गया प्रायश्चित्त माँजे हुए दर्पण में रूप की तरह निखरकर चमक जाता है।

3. कर्मवश या प्रमाद आदि से हुए दोषों का 'मिथ्या मे दुष्कृतम्' इस रूप से प्रतीकार करना प्रतिक्रमण है।

4. कुछ दोष आलोचनामात्र से शुद्ध होते हैं, कुछ प्रतिक्रमण से तथा कुछ दोनों से शुद्ध होते हैं। यह तदुभय है। सभी प्रतिक्रमण नियम से आलोचनपूर्वक होते हैं । यह गुरु की आज्ञा से शिष्य करता है। जहाँ केवल प्रतिक्रमण से दोषशुद्धि होती है वहाँ वह स्वयं गुरु के द्वारा ही किया जाता है; क्योंकि गुरु स्वयं किसी अन्य से आलोचना नहीं करता।

5-10. प्राप्त अन्न-पान और उपकरण आदि का त्याग विवेक है। काल का नियम करके कायोत्सर्ग आदि करना व्युत्सर्ग है। अनशन और अवमोदर्य आदि तप हैं। चिर-प्रव्रजित साधु की अमुक दिन पक्ष और माह आदि की दीक्षा का छेद करना छेद है। पक्ष, माह आदि तक संघ से बाहिर रखना परिहार है। महाव्रतों का मूलच्छेद करके फिर दीक्षा देना उपस्थापना है ।

विद्या और ध्यान के साधनों के ग्रहण करने आदि में प्रश्न-विनय के बिना प्रवृत्ति करना दोष है, उसका प्रायश्चित्त मात्र आलोचना है। देश और काल के नियम से अवश्यकर्तव्य विधानों को धर्मकथा आदि के कारण भूल जाने पर पुनः करने के समय प्रतिक्रमण प्रायश्चित्त है। भय, शीघ्रता, विस्मरण, अज्ञान, अशक्ति और आपत्ति आदि कारणों से महाव्रतों में अतिचार लगने पर छेद से पहिले के छहों प्रायश्चित्त होते हैं । शक्ति को न छिपाकर प्रयत्न से परिहार करते हुए भी किसी कारणवश अप्रासुक के स्वयं ग्रहण करने या ग्रहण कराने छोड़े हुए प्रासुक का विस्मरण हो जाय और करने पर उसका स्मरण आ जाय तो उसका पुनः उत्सर्ग करना ही प्रायश्चित्त है। दुःस्वप्न, दुश्चिन्ता, मलोत्सर्ग, मूत्र का अतिचार, महानदी और महाअटवी के पार करने आदि में व्युत्सर्ग प्रायश्चित्त है । बार-बार प्रमाद, बहुदृष्ट अपराध, आचार्यादि के विरुद्ध वर्तन करना तथा विरुद्धदृष्टि-सम्यग्दर्शन की विराधना होने पर क्रमशः अनुपस्थापन और पारंचिक विधान किया जाता है ।
  • अपकृष्ट आचार्य के मूल में प्रायश्चित्त ग्रहण कराना अनुपस्थापन है।
  • तीन आचार्यों तक एक आचार्य से अन्य आचार्य के पास भेजना पारंचिक है।
ये नवों प्रायश्चित्त देश, काल, शक्ति और संयम आदि के अविरोध रूप से अपराध के अनुसार दोषप्रशमन के लिये औषधि की तरह ग्रहण करने चाहिये । यद्यपि जीव के परिणाम असंख्येय-लोक-प्रमाण हैं और अपराध भी उतने ही हैं पर प्रायश्चित्त तो उतने प्रकार के नहीं हो सकते। अतः व्यवहारनय से वर्गीकरण करके प्रायश्चित्तों का स्थूल निर्देश किया है।