
सर्वार्थसिद्धि :
गुरू के समक्ष दश दोषों को टालकर अपने प्रमाद का निवेदन करना आलोचना है। 'मेरा दोष मिथ्या हो' गुरू से ऐसा निवेदन करके अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना प्रतिक्रमण है। आलोचना और प्रतिक्रमण इन दोनों का संसर्ग होने पर दोषों का शोधन होने से तदुभय प्रायश्चित्त है। संसक्त हुए अन्न, पान और उपकरण आदि का विभाग करना विवेक प्रायश्चित्त है। कायोत्सर्ग आदि करना व्युत्सर्ग प्रायश्चित्त है। अनशन, अवमौदर्य आदि करना तप प्रायश्चित्त है। दिवस, पक्ष और महीना आदि की प्रव्रज्या का छेद करना छेद प्रायश्चित्त है। पक्ष, महीना आदि के विभाग से संघ से दूर रखकर त्याग करना परिहार प्रायश्चित्त है। पुन: दीक्षा का प्राप्त करना उपस्थापना प्रायश्चित्त है। विनय के भेदों का ज्ञान कराने के लिये आगे का सूत्र कहते हैं :- |
राजवार्तिक :
1. प्रायः साधुलोक, जिस क्रिया में साधुओं का चित्त हो वह प्रायश्चित्त । अथवा, प्रायअपराध, उसका शोधन जिससे हो वह प्रायश्चित्त । प्रमाद, दोष, व्युदास, भावप्रसाद, निःशल्यत्व, अव्यवस्थानिवारण, मर्यादा का पालन, संयम की दृढ़ता, आराधना सिद्धि आदि के लिए प्रायश्चित्त से विशुद्ध होना आवश्यक है। 2. एकान्त में विराजमान प्रसन्नचित्त गुरु के समक्ष देशकालज्ञ शिष्य के द्वारा सविनय आत्मदोषों का निवेदन करना आलोचन है। आलोचना दस दोष रहित करनी चाहिये। वे दोष ये हैं -
3. कर्मवश या प्रमाद आदि से हुए दोषों का 'मिथ्या मे दुष्कृतम्' इस रूप से प्रतीकार करना प्रतिक्रमण है। 4. कुछ दोष आलोचनामात्र से शुद्ध होते हैं, कुछ प्रतिक्रमण से तथा कुछ दोनों से शुद्ध होते हैं। यह तदुभय है। सभी प्रतिक्रमण नियम से आलोचनपूर्वक होते हैं । यह गुरु की आज्ञा से शिष्य करता है। जहाँ केवल प्रतिक्रमण से दोषशुद्धि होती है वहाँ वह स्वयं गुरु के द्वारा ही किया जाता है; क्योंकि गुरु स्वयं किसी अन्य से आलोचना नहीं करता। 5-10. प्राप्त अन्न-पान और उपकरण आदि का त्याग विवेक है। काल का नियम करके कायोत्सर्ग आदि करना व्युत्सर्ग है। अनशन और अवमोदर्य आदि तप हैं। चिर-प्रव्रजित साधु की अमुक दिन पक्ष और माह आदि की दीक्षा का छेद करना छेद है। पक्ष, माह आदि तक संघ से बाहिर रखना परिहार है। महाव्रतों का मूलच्छेद करके फिर दीक्षा देना उपस्थापना है । विद्या और ध्यान के साधनों के ग्रहण करने आदि में प्रश्न-विनय के बिना प्रवृत्ति करना दोष है, उसका प्रायश्चित्त मात्र आलोचना है। देश और काल के नियम से अवश्यकर्तव्य विधानों को धर्मकथा आदि के कारण भूल जाने पर पुनः करने के समय प्रतिक्रमण प्रायश्चित्त है। भय, शीघ्रता, विस्मरण, अज्ञान, अशक्ति और आपत्ति आदि कारणों से महाव्रतों में अतिचार लगने पर छेद से पहिले के छहों प्रायश्चित्त होते हैं । शक्ति को न छिपाकर प्रयत्न से परिहार करते हुए भी किसी कारणवश अप्रासुक के स्वयं ग्रहण करने या ग्रहण कराने छोड़े हुए प्रासुक का विस्मरण हो जाय और करने पर उसका स्मरण आ जाय तो उसका पुनः उत्सर्ग करना ही प्रायश्चित्त है। दुःस्वप्न, दुश्चिन्ता, मलोत्सर्ग, मूत्र का अतिचार, महानदी और महाअटवी के पार करने आदि में व्युत्सर्ग प्रायश्चित्त है । बार-बार प्रमाद, बहुदृष्ट अपराध, आचार्यादि के विरुद्ध वर्तन करना तथा विरुद्धदृष्टि-सम्यग्दर्शन की विराधना होने पर क्रमशः अनुपस्थापन और पारंचिक विधान किया जाता है ।
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