
सर्वार्थसिद्धि :
वैयावृत्य के दश भेद हैं, क्योंकि उसका विषय दश प्रकार का है। यथा- आचार्य-वैयावृत्य और उपाध्याय-वैयावृत्य आदि। जिसके निमित्त से व्रतों का आचरण करते हैं वह आचार्य कहलाता है। मोक्ष के लिए पास जाकर जिससे शास्त्र पढ़ते हैं वह उपाध्याय कहलाता है। महोपवास आदि का अनुष्ठान करने वाला तपस्वी कहलाता है। शिक्षाशील शैक्ष कहलाता है। रोग आदि से क्लान्त शरीर वाला ग्लान कहलाता है। स्थविरों की सन्तति को गण कहते हैं। दीक्षकाचार्य के शिष्य समुदाय को कुल कहते हैं। चार वर्ण के श्रमणों के समुदाय को संघ कहते हैं। चिरकाल से प्रव्रजित को साधु कहते हैं। लोकसम्मत साधु को मनोज्ञ कहते हैं। इन्हें व्याधि होने पर, परीषह के होने पर व मिथ्यात्व आदि के प्राप्त होने पर शरीर की चेष्टा द्वारा या अन्य द्रव्य द्वारा उनका प्रतीकार करना वैयावृत्य तप है। यह समाधि की प्राप्ति, विचिकित्सा का अभाव और प्रवचनवात्सल्य की अभिव्यक्ति के लिए किया जाता है। स्वाध्याय के भेदों का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं- |
राजवार्तिक :
1-2. वैयावृत्त्य की अनुवृत्ति करके उसका आचार्य वैयावृत्त्य आदि रूप से प्रत्येक के साथ सम्बन्ध कर लेना चाहिये। कामचेष्टा या अन्य द्रव्यों से व्यावृत्त पुरुष का भाव या कर्म वैयावृत्त है। 3-14.
15-16. इनपर व्याधि परीषह मिथ्यात्व आदि का उपद्रव होने पर उसका प्रासुक-औषधि, आहारपान, आश्रय, चौकी, तख्ता, और संथरा आदि धर्मोपकरणों से प्रतीकार करना तथा सम्यक्त्वमार्ग में दृढ़ करना वैयावृत्त्य है। औषध आदि के अभाव में अपने हाथ से खकार, नाक आदि भीतरी मल को साफ करना और उनके अनुकूल वातावरण को बना देना आदि भी वैयावृत्त्य है। 17-18. समाधिधारण, ग्लानि का जय, प्रवचनवात्सल्य तथा दूसरों में सनाथवृत्ति जताने आदि के लिये वैयावृत्त्य का करना आवश्यक है। यद्यपि संघ-वैयावृत्त्य या गण-वैयावृत्त्य इस संक्षिप्त कथन से कार्य चल सकता था फिर भी वैयावृत्त्य के योग्य अनेक पात्रों का निर्देश इसलिये किया है कि इनमें से किसी में किसी की प्रवृत्ति हो सकती है तथा करनी चाहिये । |