+ धर्म-ध्‍यान -
आज्ञापाय-विपाक-संस्थान-विचयाय धर्म्यम् ॥36॥
अन्वयार्थ : आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्‍थान इनकी विचारणा के निमित्त मन को एकाग्र करना धर्म्‍यध्‍यान है ॥३६॥
Meaning : The contemplation of objects of revelation, misfortune or calamity, fruition of karmas, and the structure of the universe, is virtuous concentration.

  सर्वार्थसिद्धि    राजवार्तिक 

सर्वार्थसिद्धि :

विचयन करना विचय है। विचय, विवेक और विचारणा ये पर्याय नाम हैं। आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्‍थान इनका परस्‍पर द्वन्‍द्व समास होकर विचय शब्‍द के साथ षष्‍ठीतत्‍पुरुष समास है और इस प्रकार 'आज्ञापायविपाकसंस्‍थानविचय:' पद बना है। 'स्‍मृतिसमन्‍वाहार:' पद की अनुवृत्ति होती है। और उसका प्रत्‍येक के साथ सम्‍बन्‍ध होता है। यथा- आज्ञाविचय के लिए स्‍मृतिसमन्‍वाहार आदि। स्‍पष्‍टीकरण इस प्रकार है-

उपदेश देने वाले का अभाव होने से, स्‍वयं मन्‍दबुद्धि होने से, कर्मों का उदय होने से तथा पदार्थों के सूक्ष्‍म होने से तत्त्‍व के समर्थन में हेतु और दृष्‍टान्‍त का अभाव होने पर सर्वज्ञप्रणीत आगम को प्रमाण करके 'यह इसी प्रकार है, क्‍योंकि जिन अन्‍यथावादी नहीं होते' इस प्रकार गहन पदार्थ के श्रद्धान द्वारा अर्थ का अवधारण करना आज्ञाविचय धर्म्‍यध्‍यान है। अथवा स्‍वयं पदार्थों के रहस्‍य को जानता है और दूसरों के प्रति उसका प्रतिपादन करना चाहता है, इसलिए स्‍व-सिद्धांत के अविरोध द्वारा तत्त्‍व का समर्थन करने के लिए उसका जो तर्क, नय और प्रमाण की योजनरूप निरन्‍तर चिन्‍तन होता है वह सर्वज्ञ की आज्ञा को प्रकाशित करने वाला होने से आज्ञाविचय कहा जाता है।

मिथ्‍यादृष्टि जीव जन्‍मान्‍ध पुरुष के समान सर्वज्ञप्रणीत मार्ग से विमुख होते हैं, उन्‍हें सन्‍मार्ग का परिज्ञान न होने से वे मोक्षार्थी पुरुषों को दूर से ही त्‍याग देते हैं इस प्रकार सन्‍मार्ग के अपाय का चिन्‍तन करना अपायविचय धर्म्‍यध्‍यान है। अथवा, ये प्राणी मिथ्‍यादर्शन, मिथ्‍याज्ञान और मिथ्‍याचारित्र से कैसे दूर होंगे इस प्रकार निरन्‍तर चिन्‍तन करना अपायविचय धर्म्‍यध्‍यान है।

ज्ञानावरणादि कर्मों के द्रव्‍य, क्षेत्र, काल, भव और भावनिमित्तक फल के अनुभव के प्रति उपयोग का होना विपाकविचय धर्म्‍यध्‍यान है। तथा

लोक के आकार और स्‍वभाव का निरन्‍तर चिन्‍तन करना संस्‍थानविचय धर्म्‍यध्‍यान है।

पहले उत्तम क्षमादिरूप धर्मका स्‍वरूप कह आये हैं। उससे अनपेत अर्थात् युक्‍त धर्म्‍यध्‍यान चार प्रकार का जानना चाहिए। यह अविरत, देशविरत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत जीवों के होता है।

तीन ध्‍यानों का कथन किया, इस समय शुक्‍लध्‍यान का कथन करना चाहिए, उसके आगे चार भेद कहने वाले हैं उनमें-से आदि के दो भेदों के स्‍वामीका कथन करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
राजवार्तिक :

1-3 विचय विवेक और विचारणा सभी एकार्थक हैं। आज्ञा आदि के विचय के लिये जो स्मृतिसमन्वाहार-चिन्तनधारा है वह धर्म्य-ध्यान है।

4-5. इस काल में उपदेष्टा का अभाव है, बुद्धि मन्द है, कर्मों का तीव्र उदय है, पदार्थ सूक्ष्म हैं, उनकी सिद्धि के लिये हेतु और दृष्टान्त मिलते नहीं हैं, अतः सर्वज्ञप्रणीत आगम को प्रमाण मानकर 'यह ऐसा ही है, जिनेन्द्र अन्यथावादी नहीं हो सकते' इस प्रकार गहन पदार्थों का श्रद्धान करके पदार्थों का निश्चय करना आज्ञाविचय है। अथवा, स्व-समय, पर-समय के रहस्य के जानकार और विशुद्ध सम्यग्दृष्टि वक्ता के द्वारा सर्वज्ञप्रणीत अतिसूक्ष्म धर्मास्तिकाय आदि पदार्थों का दृढ़ निश्चय करके स्वसिद्धान्ताविरोधी हेतु, प्रमाण, नय, दृष्टान्त आदि की सम्यक योजना से परवादियों के तर्क-जाल का भेदन कर उन्हें अपने मत के प्रति सहिष्णु बनाना और ऐसी धर्म-कथा करना जिससे श्रुत की प्रभावना हो, वह सर्वज्ञ की आज्ञा की प्रकाशक होने से आज्ञाविचय धर्म्य ध्यान है।

6-7. मिथ्यादर्शन से जिनके ज्ञाननेत्र अन्धकाराच्छन्न हो रहे हैं उनकी आचार, विनय, अप्रमाद आदि विधियाँ अविद्याबहुल होने से संसार को ही बढ़ाती हैं। जैसे बलवान भी जात्यन्ध सत्पथ से प्रच्युत होकर कुशल मार्गदर्शक के बताये पथ पर न चलने के कारण ऊँचे-नीचे कंकरीले-पथरीले जंगली मार्ग में भटक जाते हैं, वे प्रयत्न करने पर भी सन्मार्ग को नहीं पा पाते उसी तरह सर्वज्ञप्रणीत आज्ञा से विमुख मोक्षार्थी सम्यक् पथ का ज्ञान न होने से सन्मार्ग से दूर ही भटक रहे हैं, इस प्रकार सन्मार्ग के अपाय का चिन्तन अपायविचय ध्यान है । अथवा, मिथ्यादर्शन से आकुलित चित्तवाले प्रवादियों के द्वारा प्रचारित कुमार्ग से ये प्राणी कैसे हटकर सुमार्ग में लगें और अनायतन-सेवा से विरक्त हों, कैसे ये पापकारी वचन और भावनाओं से निवृत होकर सुपथगामी बनें इस प्रकार अपायचिन्तन अपायविचय ध्यान है।

८.
  • ज्ञानावरण आदि कर्मों के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भाव निमित्तक फलानुभवन का विचार विपाकविचय है। मिथ्यात्व, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्तक और साधारण इन दस प्रकृतियों का प्रथम गुणस्थान में ही उदय है आगे नहीं।
  • अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान-माया-लोभ का प्रथम और द्वितीय गुणस्थानों में उदय है आगे नहीं।
  • सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति का तीसरे में ही उदय है आगे पीछे नहीं।
  • अप्रत्याख्यान क्रोध-मान-माया-लोभ, नरकायु, देवायु, नरकगति, देवगति, वैक्रियिक-शरीर, वैक्रियिक-अंगोपांग, चारों-आनुपूर्वी, दुर्भग, अनादेय और अयशस्कीर्ति इन सत्रह कर्म-प्रकृतियों का उदय असंयत सम्यग्दृष्टि तक ही होता है आगे नहीं।
  • चारों आनुपूर्वियों का उदय मिश्र गुणस्थान में नहीं होता।
  • प्रत्याख्यान क्रोध-मान-माया-लोभ-तिर्यंचगति, उद्योत और नीच-गोत्र इन आठ प्रकृतियों का उदय देशसंयत गुणस्थान तक होता है आगे नहीं।
  • निद्रा-निद्रा, प्रचला-प्रचला और स्त्यानगृद्धि इन तीन कर्म प्रकृतियों का उदय आहारक शरीर की निवृत्ति न करनेवाले प्रमत्तसंयतों के होता है । आहारक-शरीर और आहारक-शरीर-अङ्गोपाङ्ग का उदय प्रमत्तसंयत में ही होता है न ऊपर और न नीचे,
  • सम्यक्त्व प्रकृति का उदय असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्तसंयत पर्यन्त होता है।
  • अर्धनाराच-संहनन, कीलक-संहनन और असंप्राप्तामृपाटिका-संहनन इन तीन प्रकृतियों का उदय अप्रमत्तसंयत तक होता है आगे नहीं।
  • हास्य, रति, अरति, शोक, भय, और जुगुप्सा इन छह कर्म प्रकृतियों का उदय अपूर्वकरण के चरम-समय तक होता है।
  • तीनों वेद और क्रोध-मान-माया संज्वलनों का उदय अनिवृत्तिबादरसाम्पराय तक है। इनका उदयच्छेद अनिवृत्तिबादरसाम्पराय के सात भागों के एक-एक भाग में क्रमशः हो जाता है।
  • लोभसंज्वलन का उदय दसवें गुणस्थान तक होता है । वज्रनाराच और नाराच संहनन का उदय उपशान्त कषाय तक होता है ।
  • निद्रा और प्रचला का उदय क्षीणकषाय के उपान्त्य समय तक होता है। पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तरायों का उदय क्षीणकषाय के चरम समय तक होता है ।
  • कोई एक वेदनीय, औदारिक, तैजस, कार्मणशरीर, छह-संस्थान, औदारिकशरीराङ्गोपाङ्ग, वनवृषभनाराचसंहनन, वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छवास, प्रशस्त-अप्रशस्त विहायोगति, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुस्वर, दुःस्वर और निर्माण इन तीस प्रकृतियों का उदय सयोगकेवली के चरम-समय तक है, आगे नहीं।
  • कोई एक वेदनीय, मनुष्यायु, मनुष्यगति, पञ्चन्द्रियजाति, त्रस, बादर, पर्याप्तक, सुभग, आदेय, यशस्कीर्ति और उच्चगोत्र इन ग्यारह प्रकृतियों का उदय अयोगकवली के चरम समय तक है आगे नहीं।
  • तीर्थंकर प्रकृति का उदय दोनों केवलियों के होता है अन्य के नहीं।


5. अयथाकाल-बिना समय आगे होनेवाला कर्मविपाक उदीरणोदय है ।
  • मिथ्यादर्शन का उदीरणोदय उपशमसम्यक्त्व के अभिमुख मिथ्याष्टि के चरमावली को छोड़कर अन्यत्र होता है।
  • एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्तक और साधारण इन नव प्रकृतियों का उदीरणोदय मिथ्याष्टि के होता है आगे नहीं।
  • अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान-माया-लोभ का उदीरणोदय मिथ्यादृष्टि और सासादन सम्यग्दृष्टि के होता है ऊपर नहीं।
  • सम्यङमिथ्यात्व का उदीरणोदय मिश्र में ही होता है न आगे और न पीछे।
  • अप्रत्याख्यानावरण क्रोध-मान-माया -लोभ, नरकगति, देवगति, वैक्रियिक-शरीर, वैक्रियिक-अङ्गोपाङ्ग, दुर्भग, अनादेय और अयशस्कीर्ति इन ग्यारह प्रकृतियों की उदीरणा असंयतसम्यग्दृष्टि तक होती है।
  • नरकायु और देवायु की मरणकाल में चरमावली को छोड़कर असंयतसम्यग्दृष्टि में ही उदीरणोदय होता है न ऊपर और न नीचे।
  • चारों आनुपूर्वियों की विग्रहगति में ही मिथ्यादृष्टि, सासादन और असंयतसम्यग्दृष्टि में उदीरणा होती है।
  • प्रत्याख्यान क्रोध-मान-माया-लोभ, तिर्यञ्चगति, उद्योत और नीचगोत्र इन सात प्रकृतियों की संयतासंयत तक उदीरणा होती है आगे नहीं ।
  • तियंच-आयु की मरणकाल में चरमावली को छोड़कर संयतासंयत तक उदीरणा होती है आगे नहीं।
  • निद्रा-निद्रा, प्रचला-प्रचला, स्त्यांगृद्धि, सातावेदनीय और असातावेदनीय की प्रमत्तसयत तक उदीरणा होती है, उत्तर-आहारकशरीरवालों में चेरमावली में उदीरणा नहीं होती।
  • आहारकशरीर और आहारक-शरीर-अङ्गोपाङ्ग का प्रमत्तसंयत में उदीरणोदय होता है आगे पीछे नहीं।
  • मनुष्यायु की उदीरणा मरणकाल में चरमावली को छोड़कर मिश्रगुणस्थान के सिवाय प्रमत्तसंयत गुणस्थान तक होती है।
  • वेदक सम्यक्त्व का उदीरणोदय असंयत सम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्तसंयत तक होता है आगे पीछे नहीं।
  • अर्धनाराच, कीलक, असंप्राप्तामृपाटिकासंहनन का उदीरणोदय अप्रमत्तसंयत तक होता है आगे पीछे नहीं।
  • हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा इन छह प्रकृतियों का उदीरणोदय अपूर्वकरण के चरम समय तक होता है आगे-पीछे नहीं।
  • तीनों-वेद और तीन-संज्वलन की उदीरणा अनिवृत्तिबादर-साम्पराय तक होती है। उसके छह भागों में प्रत्येक में एक-एक का उदीरणा छेद हो जाता है ।
  • सूक्ष्मसाम्पराय की चरमावली को छोड़कर शेष दशों गुणस्थानवर्तियों के लोभ-संज्वलन की उदीरणा होती है।
  • वज्रनाराचसंहनन और नाराचसंहनन का उदीरणोदय उपशान्त कषाय में होता है आगे-पीछे नहीं। बारहवें गुणस्थान की एक-समय अधिक चरमावली को छोड़कर क्षीणकषायान्त जीवों के निद्रा और प्रचला की उदीरणा होती है।
  • पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तरायों का उदीरणोदय चरमावली रहित क्षीणकषायान्त जीवों के होता है।
  • मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिक-तैजस-कार्मण शरीर, छह-संस्थान, औदारिक-शरीरांगोपांग, वज्रवृषभनाराच-संहनन, वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, उच्छ्वास, प्रशस्त-अप्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुस्वर, दुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, निर्माण और उच्चगोत्र इन अड़तीस प्रकृतियों की उदीरणा सयोगकेवली के चरम-समय तक होती है ।
  • तीर्थकर-प्रकृति की उदीरणा सयोगकेवली के ही होती है आगे-पीछे नहीं।


लोक के स्वभाव संस्थान तथा द्वीप नदी आदि के स्वरूप का विचार संस्थान विचय है।

11-12. उत्तमक्षमा आदि दस धर्मों से ओत-प्रोत होने के कारण यह धर्म्यध्यान कहलाता है। उत्तमक्षमादि भावनावाले के यह होता है। अनित्य आदि अनुप्रेक्षाओं में जब बार-बार चिन्तनधारा चालू रहती है तब वे ज्ञानरूप हैं पर जब उनमें एकाग्रचिन्तानिरोध होकर चिन्तनधारा केन्द्रित हो जाती है तब वे ध्यान कहलाती हैं।

13. तत्त्वार्थाधिगमभाष्यसम्मत सूत्रपाठ में धर्म्यध्यान अप्रमत्तसंयत के बताया है, पर वह ठीक नहीं है, क्योंकि धर्म्यध्यान सम्यग्दर्शनपूर्वक होता है अतः वह असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और प्रमत्तसंयत के भी होता है। यदि उक्त अवधारण किया जाता है तो इनकी निवृत्ति हो जायगी।

14-15. उपशान्तकषाय और क्षीणकषाय में शुक्लध्यान माना जाता है, उनमें धर्म्यध्यान नहीं होता। दोनों मानना उचित नहीं है। क्योंकि आगम में श्रेणियों में शक्ल-ध्यान ही बताया है धर्म्यध्यान नहीं।