
सर्वार्थसिद्धि :
जिसके समस्त ज्ञानावरण का नाश हो गया है ऐसे सयोगकेवली और अयोगकेवली के पर अर्थात् अन्त के दो शुक्लध्यान होते हैं। अब क्रम से शुक्लध्यान के भेदों का कथन करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं- |
राजवार्तिक :
अंतिम के दो शुक्ल-ध्यान केवलज्ञानी के होते हैं प्रश्न – यदि आदि के दो शुक्लध्यान उपशान्त-काषायी और क्षीण-मोही के नियम से होते हैं तो शेष दो शुक्ल-ध्यान किसके होते हैं ? उत्तर – 'केवली' यह शब्द सामान्य है, अत: इस केवली शब्द से अचिंत्य विभूति रूप केवलज्ञान साम्राज्य का अनुभव करने वाले सयोग-केवली और अयोग-केवली इन दोनों का ग्रहण करना चाहिये । इससे यह फलितार्थ हुआ की उपशांत-मोही के पृथकत्व-वितर्क शुक्ल-ध्यान, क्षीणमोही (बारहवें गुणस्थान) के एकत्व-वितर्क शुक्ल-ध्यान, सयोग-केवली के सूक्ष्म-क्रिया-प्रतिपाती और अयोग-केवली के व्युपरत-क्रिया-निवृत्ति शुक्ल-ध्यान होता है । अत: अन्तिम दो शुक्ल-ध्यान केवली के गुणस्थान होते हैं, छद्मस्थों के नहीं । प्रश्न – अंधकार को मुष्टि से घात करने के समान इस शुक्लध्यान का अनुष्ठान करने वालों की प्रक्रिया के प्रति हमारी प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि उनके लक्षण विशेष के निर्देश की उपलब्धि नहीं होती ? उत्तर – यदि इनके लक्षण-विशेष का निर्देश नहीं होता तो इनके परस्पर विशिष्ट पर्यायान्तर नहीं होते, परन्तु परस्पर जो पर्यायान्तर हैं, उन्हें कहते हैं - |