सर्वार्थसिद्धि :
क्षेत्रादिक तेरह अनुयोगों के द्वारा सिद्ध जीव साध्य हैं अर्थात् विभाग करने योग्य हैं और यह विभाग वर्तमान और भूत का अनुग्रह करने वाले दो नयों की विवक्षा से किया गया है। यथा- क्षेत्र की अपेक्षा किस क्षेत्र में सिद्ध होते हैं ? वर्तमान को ग्रहण करने वाले नय की अपेक्षा सिद्धि क्षेत्र में, अपने प्रदेश में या आकाश-प्रदेश में सिद्धि होती है। अतीत को ग्रहण करने वाले नय की अपेक्षा जन्म की अपेक्षा पन्द्रह कर्मभूमियों में और अपहरण की अपेक्षा मानुष क्षेत्र में सिद्धि होती है। काल- काल की अपेक्षा किस काल में सिद्धि होती है ? वर्तमानग्राही नय की अपेक्षा एक समय में सिद्ध होता हुआ सिद्ध होता है। अतीतग्राही नय की अपेक्षा जन्म की अपेक्षा सामान्य रूप में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी में उत्पन्न हुआ सिद्ध होता है। विशेष रूप से अवसर्पिणी काल में सुषमा-दु:षमा में सिद्ध नहीं होता। इस कालको छोड़कर अन्यकालमें सिद्ध होता है। गति- गति की अपेक्षा किस गति में सिद्धि होती है ? सिद्धगति में या मनुष्यगति में सिद्धि होती है। लिंग- किस लिंग से सिद्धि होती है ? अवेद भाव से या तीनों वेदों से सिद्धि होती है। यह कथन भाव की अपेक्षा है द्रव्य की अपेक्षा नहीं। द्रव्य की अपेक्षा पुलिंग से ही सिद्धि होती है अथवा निर्ग्रन्थलिंग से सिद्धि होती है। भूतपूर्वनय की अपेक्षा सग्रन्थ लिंग से सिद्धि होती है। तीर्थ- तीर्थ सिद्धि दो प्रकारकी है- तीर्थं- करसिद्ध और इतरसिद्ध। इतर दो प्रकार के हैं, कितने ही जीव तीर्थंकर के रहते हुए सिद्ध होते हैं और कितने ही जीव तीर्थंकर के अभाव में सिद्ध होते हैं। चारित्र- किस चारित्र से सिद्धि होती है ? नामरहित चारित्र से सिद्धि होती है या एक, चार और पाँच प्रकार के चारत्रि से सिद्धि होती है। प्रत्येकबुद्ध-बोधितबुद्ध- अपनी शक्तिरूप निमित्त से होने वाले ज्ञान के भेद से प्रत्येकबुद्ध होते हैं और परोपदेशरूप निमित्त से होने वाले ज्ञान के भेद से बोधितबुद्ध होते हैं, इस प्रकार ये दो प्रकार के हैं। ज्ञान- किसी ज्ञान से सिद्धि होती है। एक, दो, तीन और चार प्रकार के ज्ञान विशेषों से सिद्धि होती है। अवगाहना- आत्मप्रदेश में व्याप्त करके रहना इसका नाम अवगाहना है। वह दो प्रकार की है- जघन्य और उत्कृष्ट। उत्कृष्ट अवगाहना पाँच सौ पच्चीस धनुष है और जघन्य अवगाहना कुछ कम साढ़े तीन अरत्नि है। बीच के भेद अनेक हैं। किसी एक अवगाहना में सिद्धि होती है। अन्तर- क्या अन्तर है ? सिद्धि को प्राप्त होने वाले सिद्धों का जघन्य अन्तर का अभाव दो समय है और उत्कृष्ट अन्तर का अभाव आठ समय। जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना। संख्या- जघन्य रूप से एक समय में एक जीव सिद्ध होता है और उत्कृष्ट रूप से एक समय में एक सौ आठ जीव सिद्ध होते हैं। अल्पबहुत्व- क्षेत्रादि की अपेक्षा भेदों को प्राप्त जीवों की परस्पर संख्या का विशेष प्राप्त करना अल्पबहुत्व है। यथा- वर्तमान नय की अपेक्षा सिद्धिक्षेत्र में सिद्ध होने वाले जीवों का अल्पबहुत्व नहीं है। भूतपूर्व नय की अपेक्षा विचार करते हैं- क्षेत्र सिद्ध जीव दो प्रकारके हैं- जन्मसिद्ध और संहरणसिद्ध। इनमें-से संहरणसिद्ध जीव सबसे अल्प हैं। इनसे जन्मसिद्ध जीव संख्यातगुणे हैं। क्षेत्रों का विभाग इस प्रकार है- कर्मभूमि, अकर्मभूमि, समुद्र, द्वीप, ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और तिर्यग्लोक। इनमें से ऊर्ध्वलोक सिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे अधोलोक सिद्ध संख्यातगुणे हैं, इनसे तिर्यग्लोक सिद्ध संख्यातगुणे हैं। समुद्रसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे द्वीपसिद्ध संख्यातगुण हैं। यह सामान्य रूपसे कहा है। विशेष रूप से विचार करने पर लवण समुद्रसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे कालोद सिद्ध संख्यातगुण हैं। इनसे जम्बूद्वीप सिद्ध संख्यातगुणे हैं। इनसे धातकी खण्ड सिद्ध संख्यातगुण हैं। इनसे पुष्करार्द्ध द्वीप सिद्ध संख्यातगुण हैं। इसी प्रकार कालादि का विभाग करने पर भी आगम के अनुसार अल्पबहुत्व जान लेना चाहिए। इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे दशमोऽध्याय:॥१०॥ अक्षर-मात्र पद-स्वर-हीनं, व्यंजन-संधि-विवर्जित-रेफम्। साधुभिरत्र मम क्षमितव्यं, को न विमुह्यति शास्त्रसमुदे्र॥१॥ दशाध्याये परिच्छिन्ने, तत्त्वार्थे पठिते सति। फलं स्यादुपवासस्य, भाषितं मुनिपुंगवै:॥२॥ तत्त्वार्थ - सूत्र - कत्र्तारं, गृद्धपिच्छोपलक्षितम्। वन्दे गणीन्द्र - संजातमुमास्वामि - मुनीश्वरम्॥३॥ |
राजवार्तिक :
1. इन क्षेत्र आदि बारह अनुयोगों को प्रत्युत्पन्न और अतीत की अपेक्षा लगाकर सिद्धों में भेद करना चाहिये। 2. प्रत्युत्पन्ननय से सिद्धिक्षेत्र स्वप्रदेश या आकाशप्रदेश में सिद्धि होती है । भूतनय की अपेक्षा पन्द्रह कर्मभूमियों और संहरण की अपेक्षा मनुष्यलोक में सिद्धि होती है । ऋजुसूत्र तथा शब्द नय प्रत्युत्पन्नग्राही हैं और शेष नय उभय को ग्रहण करते हैं। 3. प्रत्युत्पन्न की अपेक्षा एक समय में ही सिद्ध होता है । भूतप्रज्ञापननय से जन्म की अपेक्षा सामान्यतया उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी में उत्पन्न हुआ सिद्ध होता है। विशेषरूप से अवसर्पिणी के सुषम-सुषमा के अन्तभाग और दुषमसुषमा में उत्पन्न हुआ सिद्ध होता है । दुषमसुषमा में उत्पन्न दुषमा में सिद्ध हो सकता है पर दुषमा में उत्पन्न हुआ कभी सिद्ध नहीं हो सकता। संहरण की दृष्टि से सभी कालों में सिद्ध हो सकता है। 4. प्रत्युत्पन्न दृष्टि से सिद्धगति में सिद्धि होती है और भूतनय की दृष्टि से अनन्तर गति की अपेक्षा केवल मनुष्यगति से सिद्धि होती है और एकान्तरगति की अपेक्षा चारों गतियों से सिद्धि होती है अर्थात् किसी भी गति से मनुष्य होकर सिद्ध हो सकता है। 5. वर्तमान नय की अपेक्षा अवेद अवस्था में सिद्धि होती है । अतीत की अपेक्षा साधारण रूप से तीनों वेदों से सिद्धि होती है - भाव वेद की अपेक्षा द्रव्यवेद की अपेक्षा नहीं। द्रव्यवेद की अपेक्षा तो पुल्लिंग से ही सिद्धि होती है । अथवा लिंग दो प्रकार का है एक सग्रंथ-लिंग और दूसरा निर्ग्रन्थ-लिंग । प्रत्युत्पन्ननय की अपेक्षा निर्ग्रन्थ-लिंग से सिद्धि होती है और भूतपूर्वनय की अपेक्षा विकल्प है। 6. तीर्थ सिद्धि दो प्रकार की होती है - एक तीर्थंकर रूप से तथा दूसरी तीर्थकर भिन्न रूप में । वे दोनों तीर्थंकर की मौजूदगी में भी सिद्ध होते हैं और गैरमौजूदगी में भी। 7. प्रत्युत्पन्ननय की दृष्टि से न तो चारित्र से सिद्धि होती है और न अचारित्र से किन्तु निर्विकल्पभाव से सिद्धि होती है। भूतपूर्वनय में अनन्तरदृष्टि से यथाख्यात चारित्र से सिद्धि होती है। व्यवधान से सामायिक, छेदोपस्थापना, सूक्ष्मसाम्पराय इन सहित चार से या परिहारविशुद्धि सहित पाँच से सिद्धि होती है। 8. कुछ प्रत्येकबुद्ध सिद्ध होते हैं जो परोपदेश के बिना स्वशक्ति से ही ज्ञानातिशय - प्राप्त करते हैं। कुछ बोधितबुद्ध होते हैं जो परोपदेशपूर्वक ज्ञान प्राप्त करते हैं। 9 प्रत्युत्पन्ननय की अपेक्षा एक केवलज्ञान से सिद्धि होती है। भूतपूर्व गति से मति और श्रुत दो से मति, श्रुत और अवधि या मति, श्रुत और मनःपर्यय इन तीन से अथवा मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय इन चार ज्ञानों से सिद्धि होती है। 10. अत्मप्रदेश का व्यापित्व अर्थात् अवगाहन शरीरपरिमाण है । उत्कृष्ट अवगाहना 525 धनुष और जघन्य साढ़े तीन अरत्नि प्रमाण है। मध्य में अनेक भेद होते हैं। भूतपूर्वनय से इन अवगाहनाओं में सिद्धि होती है और प्रत्युत्पन्ननय की अपेक्षा कुछ कम इन्हीं अवगाहनाओं में । 11-12. एक सिद्ध से दूसरे सिद्ध होने के मध्य का काल अन्तर है। अनन्तर जघन्य से दो समय तक और उत्कृष्ट से आठ समय तक सिद्ध होते रहते हैं। अन्तर जघन्य से एक समय और उत्कृष्ट से छह मास है। 13. एक समय में जघन्य से एक और उत्कृष्ट से 108 तक सिद्ध होते हैं । 14. क्षेत्रादि अनुयोगों के भेद से भिन्नों का परस्पर संख्यातारतम्य अल्पबहुत्व है। प्रत्युत्पन्ननय की अपेक्षा सिद्धिक्षेत्र में सिद्धि होती है अतः अल्पबहुत्व नहीं है । भूतपूर्वनय की अपेक्षा क्षेत्रसिद्ध दो प्रकारके हैं - एक जन्म की दृष्टि से और दूसरे संहरण की दृष्टि से । संहरणसिद्ध कम हैं, जन्मसिद्ध संख्यातगुणे हैं। संहरण दो प्रकार का है - एक स्वकृत और दूसरा परकृत । देवों द्वारा या चारण विद्याधरों से किया गया संहरण परकृत है और चारण विद्याधरों का स्वयं संहरण स्वकृत है। क्षेत्र -- कर्मभूमि और अकर्मभूमि, समुद्र-द्वीप ऊपर, नीचे, तिरछे आदि अनेक प्रकार के हैं। उनमें ऊर्ध्वलोकसिद्ध सबसे कम हैं। अधोलोकसिद्ध संख्येयगुणें हैं । तिर्यग्लोकसिद्ध संख्येयगुणें हैं । लवणोदसिद्ध सबसे कम हैं। कालोदसिद्ध संख्येयगुणें हैं। जम्बूद्वीपसिद्ध संख्येयगुणें हैं । धातकीखण्डसिद्ध संख्येयगुणें हैं । पुष्करद्वीपार्धसिद्ध संख्येयगुणें हैं। काल विभाग तीन प्रकारका है - उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी और अनुत्सर्पिणी-अनवसर्पिणी। उत्सर्पिणीसिद्ध सबसे कम हैं, अवसर्पिणीसिद्ध विशेषाधिक हैं, अनुत्सर्पिणी-अनवसर्पिणीसिद्ध संख्येयगुणें हैं। प्रत्युत्पन्ननय की अपेक्षा एक समय में सिद्ध होते हैं अतः अल्पबहुत्व नहीं हैं। गति की दृष्टि से प्रत्युत्पन्ननय से सिद्धगति में सिद्धि होती है अतः अल्पबहुत्व नहीं है। भूतविषयकनय की अपेक्षा अनन्तरगति मनुष्यगति में सिद्धि होती है अतः अल्पबहुत्व नहीं है । एकान्तर गति में अल्पबहुत्व है - सबसे कम तिर्यग्योनि से मनुष्य होकर सिद्ध होनेवाले हैं। मनुष्ययोनि से मनुष्य होकर सिद्ध होनेवाले संख्यातगुणें हैं। नरक योनि से आकर मनुष्य होकर सिद्ध होनेवाले संख्येयगुणें हैं। वेद की दृष्टि से - प्रत्युत्पन्ननय की अपेक्षा अवेद अवस्था में ही सिद्धि होती है। भूतपूर्वनय की अपेक्षा सबसे कम नपुंसकवेदसिद्ध हैं, स्त्रीवेदसिद्ध संख्येयगुणें हैं और पुंवेदसिद्ध संख्येयगुणें हैं। तीर्थानुयोग से तीर्थंकरसिद्ध कम हैं और इतरसिद्ध संख्येयगुणें हैं। चारित्रानुयोग से - प्रत्युत्पन्ननय की अपेक्षा निर्विकल्प चारित्र से सिद्धि होती है अतः अल्पवहुत्व नहीं है । भूतपूर्वनय की दृष्टि से अनन्तर चारित्र की अपेक्षा सभी यथाख्यात चारित्र से सिद्ध होते हैं अतः अल्पबहुत्व नहीं हैं। व्यवधान की दृष्टि से पंच चारित्रसिद्ध कम हैं और चतुश्चारित्रसिद्ध संख्येयगुणें हैं। प्रत्येकबुद्धबोधितबुद्धानुयोग से - प्रत्येकबुद्ध कम हैं और बोधितबुद्ध संख्येय ज्ञानानुयोग से - प्रत्युत्पन्ननय की दृष्टि से केवली ही सिद्ध होते हैं, अतः अन्तर नहीं है । पूर्वभावप्रज्ञापननय से द्विज्ञानसिद्ध सबसे कम हैं, चतुर्ज्ञानसिद्ध संख्येयगुणें हैं, त्रिज्ञानसिद्ध संख्येयगुणें हैं । मतिश्रुतमनःपर्ययज्ञानसिद्ध सबसे कम हैं, मतिश्रुतज्ञानसिद्ध संख्येयगुणें हैं, मतिश्रुतअवधिमनःपर्ययज्ञानसिद्ध संख्येयगुणें हैं और मतिश्रुतअवधिज्ञानसिद्ध संख्येयगुणें हैं। अवगाहनानुयोग से - जघन्य अवगाहनासिद्ध सबसे कम हैं, उत्कृष्ट अवगाहनासिद्ध संख्येयगुणें हैं। यवमध्यसिद्ध संख्येयगुणें हैं, अधोयवसिद्ध संख्येयगुणें हैं। उपरि यवसिद्ध विशेषाधिक हैं। अनन्तरानुयोग से - आठ समयानन्तरसिद्ध सबसे कम हैं । सात समयअनन्तरसिद्ध संख्येयगुणें हैं। इस तरह दो समयअनन्तरसिद्ध तक समझना चाहिये । सान्तरों में छह माह के अन्तर से सिद्ध होनेवाले सबसे कम हैं, एकसमयान्तरसिद्ध संख्येयगुणें हैं। यवमध्यान्तर सिद्ध संख्येयगुणे हैं । अधोयवमध्यान्तरसिद्ध संख्येयगुणे और उपरियवमध्यान्तरसिद्ध विशेषाधिक हैं। संख्यानुयोगसे - १०८ सिद्ध होनेवाले सबसे कम हैं, १०८से लेकर 50 तक सिद्ध होनेवाले अनन्तगुणें हैं, 49 से 25 तक सिद्ध होनेवाले असंख्येयगुणें हैं, चौबीससे एक तक सिद्ध होनेवाले संख्येयगुणें हैं। इस प्रकार निसर्ग और अधिगम से उत्पन्न होने वाला, तत्त्वार्थश्रद्धान रूप, शंकादि अतिचारों से रहित, प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य भाव से जिसका लक्षण प्रकट है, ऐसे उस विशुद्ध सम्यग्दर्शन और सम्यग्दर्शन से विशुद्ध सम्यगज्ञान को प्राप्त कर, निक्षेप, प्रमाण, निर्देश, सत्संख्यादि उपायों (अनुयोगों) के द्वारा जीवों के पारिणामिक औदयिक, औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक भावों के स्वतत्त्व को जानकर, चेतन-अचेतन भोग-साधनों की उत्पत्ति एवं विनाश स्वभाव को जानकर, विरक्त वितृष्ण त्रिगुप्तियुक्त, पंचसमिति-सहित, दशलक्षण धर्मानुष्ठान और उसका फल देखकर निर्वाण-प्राप्ति की दिशा में श्रद्धा, संवेग, भावना आदि की वृद्धि से आत्मा को भावित कर, अनुप्रेक्षाओं के चिन्तन से चित्त को स्थिर कर, विषयों से विरक्तमन होकर, आत्मा को चारों-ओर से संवरयुक्त करके, आस्नवशून्य होने से अभिनव (नवीन) कर्मों के उपचय को नष्ट करता हुआ, परीषहजय बाह्य-आभ्यन्तर तपोऽनुष्ठान और अनुभव से सम्यग्दृष्टि विरस आदि जिनपर्यन्त परिणामविशुद्धि अध्यवसानविशुद्धि आदि स्थानों को प्राप्त करके, असंख्यात गुणी उत्कर्ष की प्राप्ति से पूर्वोपाजित कर्मों की निर्जरा करता है । वह सामायिक आदि से लेकर सूक्ष्मसाम्पराय पर्यन्त संयमविशुद्धि स्थानों को उत्तरोत्तर प्राप्त करके, पुलाक से लेकर निर्ग्रन्थ पर्यन्त संयमानुपालन-विशुद्धिस्थान आदि को उत्तरोत्तर चढ़ता हुआ, आर्त-रौद्र-ध्यान से रहित होकर, घर्मध्यान की विजय से समाधि बल प्राप्त करके, पृथक्त्ववितर्क और एकत्ववितर्क शुक्लघ्यान में से किसी एक शुक्लध्यान को ध्याता हुआ, पूर्वोक्त नानाविध ऋद्धियों के मिलने पर भी उनमें अनासक्त चित्त हो, पूर्वोक्त क्रम से मोहादि का क्षय करके, सर्वज्ञज्ञानलक्ष्मी का (अर्हन्तावस्था का) अनुभव करके, तत्पश्चात् शेष अधातिया कर्मों को ईंधन-रहित अग्नि के समान क्षय करता हुआ, पूर्व शरीर का नाश हो जाने से तथा नवीन शरीर की उत्पत्ति का कारण न होने से भवबन्धन से मुक्त अशरीरी होकर, संसारदु:खों से परे आत्यन्तिक, ऐकान्तिक, निरुपम और निरतिशय निर्वाणसुख प्राप्त करता है । यही तत्त्वार्थभावना का फल हैं। कहा भी है कि -- इस प्रकार तत्त्वपरिज्ञान करके अत्यन्त विरक्त आत्मा आस्रव-रहित होने से नूतन कर्म-सन्तति के नष्ट हो जाने पर पूर्वोक्त कारणों के द्वारा पूर्वोजित कर्मों का क्षय कर संसार के बीजभूत मोहनीय कर्म को पूर्ण रूप से नष्ट कर देता है ॥१-२॥ उसके बाद ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय, ये तीनों कर्म अशेषरूप से एक साथ नष्ट हो जाते हैं । जैसे-गर्भसूची-मस्तकछत्र के (या जड़ के) नष्ट हो जाने पर (नष्ट होते ही) तालवृक्ष नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मोहनीय कर्म के नष्ट होते ही शेष तीन घातिया कर्म नष्ट हो जाते हैं ॥३-४॥ इसके बाद चार घातिया कर्मों का नाश कर अथा (यथा) ख्यातसंयम को प्राप्त और बीजबन्धन (कर्मबीज बन्धन) से विमुक्त आत्मा स्नातक परमेश्वर बन जाता है ॥५॥ शेष चार अघातिया कर्मों का उदय रहते हुए भी आत्मा शुद्ध-बुद्ध निरामय सर्वज्ञ, सर्वदर्शी केवली जिन हो जाता है ॥६॥ जैसे जली हुई अग्नि ईंधन आदि उपादान न रहने पर बुझ जाती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण कर्मों के क्षय हो जाने से आत्मा निर्वाण को प्राप्त हो जाती है, ऊर्ध्वगमन कर जाती है ॥७॥ जैसे बीज के अत्यन्त जल जाने पर अंकुर उत्पन्न नहीं होता है, उसी प्रकार कर्मबीज के भस्म हो जाने पर भवांकुर उत्पन्न नहीं हो सकता ॥८॥ कर्मक्षय के अनन्तर आत्मा पुर्वप्रयोग, असंगत्व, बन्धच्छेद और ऊर्ध्वगौरव घर्म के कारण लोकान्त तक ऊर्ध्वगमन करता है ॥९॥ जैसे-कुम्भकार के चक्र या वाण में पूर्वप्रयोगवश क्रिया होती रहती है, उसी प्रकार पूर्वप्रयोगवश कर्मों से छूटते ही आत्मा का ऊर्ध्वगमन बताया गया है । जिस प्रकार मिट्टी का लेप छूट जाने पर पानी में डूबी हुई अलाबू (तूंबड़ी) ऊपर आ जाती है वैसे ही कर्मलेप के हट जाने पर स्वाभाविक सिद्ध गति होती है अर्थात् कर्मों के लेप से रहित आत्मा ऊर्ध्वगमन करती है ॥१०-११॥ एरण्डबीज, यन्त्र तथा पेला आदि में जैसे बन्धच्छेद होने पर ऊर्ध्वगमन होता है, उसी प्रकार कर्मबन्ध का उच्छेद होने पर आत्मा का ऊर्ध्वगमन होता है, सिद्धपद की प्राप्ति होती है ॥१२॥ जिनेन्द्र भगवान ने जीव को ऊर्ध्वगौरवधर्मा तथा पुद्गल को अधोगौरवधर्मा कहा है । जिस प्रकार लोष्ठ, वायु और अग्निशिखा स्वभाव से ही नीचे, तिरछे और ऊपर को जाती है, उसी प्रकार आत्मा को स्वभावत: ऊर्ध्वगति होती है । संसारी जीवों की जो विकृत गति पाई जाती है वह या तो प्रयोग से है या फिर कर्मों के प्रतिघात से है ॥१३-१५॥ संसारी जोवों को कर्मजा (कर्मों से होने वाली) गति अध: (नीचे), तिरछे और ऊपर भी होती है, परन्तु क्षीणकर्मा जीवों की गति स्वभाव से ऊर्ध्व होती है ॥१६॥ जिस प्रकार परमाणुद्रव्य में लोकान्तगामिनी क्रिया की उत्पत्ति, आरम्भ और समाप्ति युगपत् (एक साथ) होती है उसी प्रकार संसार के क्षय हो जाने से मुक्तात्मा की गति की उत्पत्ति, आरम्भ और समाप्ति एक साथ होती है । जैसे -- प्रकाश की उत्पत्ति और अन्धकार का विनाश एक ही साथ (एक ही समय में) होता है, उसी प्रकार निर्वाण की प्राप्ति और कर्मों का नाश एक ही समय में होता है ॥१७-१८॥ लोक के शिखर पर अतिशय मनोज्ञ, तन्वी, सुरभि, पुण्या और परमभासुरी प्राग्भारा नाम की वसुधा प्रवस्थित है ।यह मनुष्यलोक के समान विस्तार वाली (४५ लाख योजन विस्तृत) शुभ एवं शुक्ल छत्र के समान है । लोकान्त में इस पृथ्वी पर सिद्ध विराजमान होते हैं । वे सिद्ध भगवान केवलज्ञान, केवलदर्शन, सम्यक्त्व और सिद्धत्व में तद्रूप से उपयुक्त हैं और क्रिया के कारणों का अभाव होने से निष्किय हैं ॥१९-२१॥ उससे भी ऊपर उनकी गति क्यों नहीं होती है? इसका समाधान यह है कि धर्मास्तिकाय का अभाव होने से लोकाकाश के बाहर सिद्धों का गमन नहीं होता । परम ऋषियों ने सिद्धों का सुख संसार के विषयों से अतीत, अव्यय (विनाशरहित) और अव्याबाध (बाधारहित) कहा है ॥२२-२३॥ अशरीरी, नष्ट-अष्टकर्मा मुक्तजीवों के कैसे, क्या सुख होता है ? इसका समाधान सुनिये -- इस लोक में चार अर्थों में सुख शब्द का प्रयोग होता है । विषयवेदना का अभाव, विपाक, कर्मफल औरमोक्ष । 'अग्निसुखकर है' 'वायु सुखकारी है', इत्यादि में सुख शब्द विषयार्थक है । रोगादि दु:खों के अभाव में पुरुष 'मैं सुखी हूँ' ऐसा समझता है, वह वेदनाभाव सुख है, पुण्यकर्म के विपाक (उदय) से जो इष्ट इन्द्रिय विषयों से सुखानुभूति होती है वह विपाकज सुख है और कर्म और क्लेश के विमोक्ष (नष्ट) होने से मोक्ष का अनुपम सुख प्राप्त होता है -- वह मोक्षसुख है ॥२४-२७॥ कोई मोक्षसुख को सुप्तावस्था के समान मानते हैं, परन्तु सुप्तावस्था के समान सुख मानना ठीक नहीं है, क्योंकि मोक्षसुख में सुखानुभव रूप क्रिया होती रहती है और सुप्तावस्था तो दर्शनावरणीय कर्म के उदय से श्रम-क्लम-मद, भय, व्याधि, काम आदि निमित्तों से उत्पन्न होती है और मोहोत्पत्ति का विकार है ॥२८-२९॥ सारे संसार में ऐसा कोर्ई पदार्थ ही नहीं है जिससे उस सुख (मोक्षसुख) की उपमा दी जाय । अतः मोक्षसुख परम निरुपम है । लिंग और प्रसिद्धि में, अनुमान और उपमान में प्रामाण्य उत्पन्न होता है परन्तु यह सिद्धों का सुख न तो लिंग से अनुमित होता है न किसी प्रसिद्ध पदार्थ मे उपमित होता है अत: यह सिद्धों का सुख अलिङ्ग एवं अप्रसिद्ध होने से निरूपम कहा है ॥३०-३१॥ वह सिद्धों का सुख भगवान अर्हंत के प्रत्यक्ष है और सर्वज्ञ के द्वारा कथित है अतः हम छद्मथ-जन उन्हीं के वचन-प्रामाण्य से उनके अस्तित्व को जानते हैं । उनका अखण्ड स्वरूप अल्पज्ञानी की परीक्षा का सर्वथा विषय नहीं हो सकता है । इस प्रकार उत्तम पुरुषों ने तत्त्वार्थसू्त्रों का भाष्य कहा है । इसमें तर्क है और न्याय तथा आगम से निर्णय है ॥३२-३३॥ इस प्रकार तस्वार्थवात्तिक व्याख्यानालंकार में दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ । |