
ननु वै केवलज्ञानमेकं प्रत्यक्षमर्थतः ।
न प्रत्यक्षं कदाचित्तच्छेषज्ञानचतुष्टयम् ॥460॥
यदि वा देशतोऽध्यक्षमाक्ष्यं स्वात्मसुखादिवत ।
स्वसंवेदनप्रत्यक्षमास्तिक्यं तत्कुतोऽर्थतः ॥461॥
अन्वयार्थ : वास्तव में एक केवल ज्ञान ही प्रत्यक्ष है बाकी के चारों ज्ञान कभी भी प्रत्यक्ष नहीं हैं ॥४६०॥
अथवा अपने आत्मा के सुखादिक की तरह इन्द्रियजन्य ज्ञान एक देश प्रत्यक्ष हैं इसलिये आस्तिक्य भाव स्व-संवेदन प्रत्यक्ष का विषय कैसे हो सकता है ? ॥४६१॥