पं-आशाधरजी
01 - मंगलाचरण
02 - आत्मा को स्वयं ही स्वरूप की उपलब्धि कैसे?
03 - अव्रत से व्रत धारण श्रेष्ठ
04 - व्रत से स्वर्ग-मोक्ष की प्राप्ति
05 - स्वर्ग सुख का वर्णन
06 - इन्द्रिय सुख-दुःख कल्पना जन्य
07 - मोह ही अज्ञान
08 - मोही जीव की पहचान
09 - संसार का स्वरूप
10 - दूसरों को दुखी करने से स्वयं दुःख की प्राप्ति
11 - अज्ञान से राग-द्वेष द्वारा संसार परिभ्रमण
12 - संसार में दुःख
13 - संसार में सुख की कल्पना व्यर्थ
14 - मोही जीव आने वाली विपत्तियों को भी नहीं देखता
15 - मोही धन को काल (प्राण) से भी अधिक चाहता है
16 - धन-कमाने की इच्छा - मोह
17 - भोग-उपभोग दुःख के कारण
18 - शरीर दुःख का कारण
19 - शरीर के उपकार में आत्मा का अपकार
20 - ध्यान से सभी इष्ट की प्राप्ति
21 - आत्मा का स्वरूप
22 - मन और इन्द्रियों को वश में कर ध्यान करें
23 - वैयावृत्ति की प्रेरणा
24 - ध्यान द्वारा कर्मों की निर्जरा
25 - आत्मा में आत्मा द्वारा आत्मा का ध्यान
26 - ममत्व भाव बंध का करण, अत: हेय
27 - भेद-ज्ञान की प्रेरणा
28 - देह के सम्बन्ध को दुःख का करण जानकर छोडो
29 - देह से भिन्नता
30 - भोगों की इच्छा व्यर्थ
31 - जीव मोह को आसानी से क्यों नहीं छोड़ता
32 - अपनी भलाई में लगाने की प्रेरणा
33 - स्व-पर के भेद को जानना - मोक्ष का कारण
34 - अपना गुरु आप ही है
35 - पर ज्ञान का कारण नहीं, निमित्त-मात्र होता है
36 - एकान्त में क्षोभ-रहित होकर आत्मा में स्थित रहने का उपदेश
37 - आत्मानुभवी के लक्षण
38 - आत्मा में रत रहने वाले को विषय भोग अरुचिकर
39 - योगी के लिए समस्त संसार एक इंद्रजाल
40 - योगी एकान्त-प्रिय होता है
41 - आत्म-स्वरूप में स्थिर के सभी व्यवहार गौण
42 - योगी विकल्पातीत होता है
43 - पर के संस्कार के त्याग का उपदेश
44 - पर पदार्थों से अस्संग ध्यान से निर्जरा
45 - अपने आपके लिए ही उद्यम का उपदेश
46 - अज्ञानी को कर्म नहीं छोड़ते
47 - आत्म-ध्यान से सुख की प्राप्ति
48 - ध्यान का फल
49 - मुमुक्षुओं को सम्यग्ज्ञान की भावना का उपदेश
50 - जीव-पुद्गल भिन्नता ही सारभूत
51 - उपसंहार और टीकाकार द्वारा प्रशस्ति
पं-आशाधरजी
!!
श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम:
!!
श्रीमद्-भगवत्पूज्यपाद-आचार्य-प्रणीत
श्री
इष्टोपदेश
मूल संस्कृत गाथा
आभार : पंडित आशाधरजी
आशाधरजी
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