श्रीब्रह्मदेव
1-001 - मंगलाचरण
1-002 - सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार
1-003 - सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार
1-004 - सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार
1-005 - सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार
1-006 - अरिहंत परमेष्ठी को नमस्कार
1-007 - आचार्य, उपाध्याय, साधु परमेष्ठी को नमस्कार
1-008 - प्रभाकरभट्ट द्वारा विनती
1-009 - विनती
1-010 - परमात्मा के कथन की विनती
1-011 - तीन प्रकार के आत्मा को कहने की प्रतिज्ञा
1-012 - तीन प्रकार के आत्मा को जानने का प्रयोजन
1-013 - बहिरात्मा
1-014 - अन्तरात्मा
1-015 - परमात्मा
1-016 - ध्येय
1-017 - लक्ष्य के लक्षण
1-018 - शान्त और शिव
1-019-021 - निरन्जन
1-022 - परमात्मा - ध्यान के साधन नहीं
1-023 - परमात्मा - ज्ञान का साधन नहीं
1-024 - परमात्मा - अनन्त ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्यमयी
1-025 - परमात्मा - शरीर रहित लोक के शिखर पर स्थित
1-026 - परमात्मा - शरीर में स्थित
1-027 - परमात्मा - अंतर-दृष्टि के प्रेरणा
1-028 - परमात्मा शारीरिक और मानसिक सुख-दुःख रहित
1-029 - [परमात्मा - देह में रहते हुए भी स्वभाव में स्थित
1-030 - भेद-ज्ञान की प्रेरणा
1-031 - आत्मा का लक्षण
1-032 - ध्यान की विधि और उसका फल
1-033 - देह में ही परमात्मा का निवास
1-034 - परमात्मा का एक अद्भुत् लक्षण
1-035 - परमात्मा - समभाव द्वारा परम आनन्द की प्राप्ति
1-036 - आत्मा का परम आत्मा स्वरूप
1-037 - पूर्व कथन की पुष्टि
1-038 - परमात्मा - केवलज्ञान में स्वयं प्रतिभासित
1-039 - परमात्मा - ध्यान का ध्येय
1-040 - परमात्मा - संसार को उपजाता है
1-041 - परमात्मा - संसार में रहते हुए भी संसार से परे
1-042 - परमात्मा उत्कृष्ट समाधि / तप द्वारा ही जाना जाता है
1-043 - परमात्मा - उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य संयुक्त
1-044 - शरीर और आत्मा के दृढ़ सम्बन्ध
1-045 - देह से आत्मा का विशिष्ट महत्व
1-046 - परमात्मा का वीतराग स्वरूप
1-047 - परमात्मा के ज्ञान के स्थान का कथन
1-048 - कर्म बंधन से मुक्त परमात्मा का स्वरूप
1-049 - कर्म बंधन से मुक्त परमात्मा का स्वरूप
1-050 - आत्मा क्या है
1-051 - आत्मा का स्वरूप
1-052 - आत्मा का सर्वव्यापक स्वरूप
1-053 - आत्मा का जड स्वरूप
1-054 - आत्मा का चरम शरीर प्रमाणरूप स्वरूप
1-055 - आत्मा के शून्य स्वरूप का कथन
1-056 - आत्मा के लक्षण
1-057 - आत्मा के लक्षण का स्पष्टीकरण
1-058 - आत्मा द्रव्य और उसके गुण
1-059 - आत्मा और कर्म का परष्पर सम्बन्ध
1-060 - सभी जीवों का प्राण कर्म
1-061 - कर्म के कारण जीव को स्वभाव-लाभ नहीं
1-062 - विषय-कषायों में लिप्तता से कर्म-बंध
1-063 - इन्द्रियाँ, मन, समस्त विभाव, दुःख कर्म-जनित
1-064 - परमार्थ से दुःख-सुख कर्म जनित
1-065-1 - जिन्वचन को नहीं मानने का परिणाम
1-065 - परमार्थ से बन्ध और मोक्ष कर्मजनित
1-066 - कर्म द्वारा ही जीव के लोक में भ्रमण
1-067 - द्रव्य-रूप परिवर्तित नहीं होता
1-068 - जीव के जन्म-मरण बंध-मोक्ष नहीं
1-069 - जीव के जन्म-मरण-रोग, इन्द्रियाँ, वर्ण नहीं
1-070 - जन्म-बुढापा-मरण, रोग, वर्ण देह के
1-071 - जीव को अमर जानकर भय-मुक्त हो
1-072 - शरीर से ममत्व त्यागकर आत्मा को ध्या
1-073 - पर-भाव और पर द्रव्य जीव स्वभाव से भिन्न
1-074 - ज्ञानमयी भाव को छोड़कर अन्य सभी भाव को त्याग
1-075 - रत्नत्रयमयी आत्मा का ध्यान कर
1-076 - सम्यग्दृष्टि
1-077 - मिथ्यादृष्टि
1-078 - कर्म बलवान हैं
1-079 - मिथ्यात्वी का लक्षण
1-080 - मिथ्यात्वी की मान्यता
1-081 - और भी
1-082 - और भी
1-083 - और भी
1-084 - अज्ञान ही पाप
1-085 - सम्यक्त्व की प्राप्ति
1-086 - आत्मा स्पर्श या वर्ण नहीं
1-087 - आत्मा के वर्ण या लिंग नहीं
1-088 - आत्मा के वेष नहीं
1-089 - आत्मा गुरु-शिष्यादिक भी नहीं
1-090 - आत्मा मनुष्य-देव आदि नहीं
1-091 - आत्मा पंडित मूर्ख आदि नहीं
1-092 - आत्मा पुण्य-पापादि नहीं
1-093 - आत्मा क्या है?
1-094 - आत्मा ही ज्ञान-दर्शन-चारित्र
1-095 - आत्मध्यान किसी तीर्थ, गुरु, देव से भी उत्कृष्ट
1-096 - आत्मा ही दर्शन
1-097 - आत्मध्यान से क्षणमात्र में मुक्ति
1-098 - आत्म-ज्ञान बिना ज्ञान तप निष्फल
1-099 - आत्मज्ञान से केवलज्ञान
1-100 - उसी को दृढ़ करते हैं
1-101 - केवलज्ञान का स्वभाव
1-102 - उदाहरण
1-103 - उपसंहार
1-104 - प्रश्न
1-105 - आत्मा का संस्थान
1-106 - पर भावों को छोड़
1-107 - आत्मा ज्ञान गोचर
1-108 - परलोक -- आत्मा से परमात्मा
1-109 - परलोक -- अपना स्वरूप जानना
1-110 - परलोक -- ध्यान का ध्येय
1-111 - जैसी मति वैसी गति
1-112 - पर-द्रव्य को मत देख
1-113 - पर-द्रव्य
1-114 - ध्यान की सामर्थ्य
1-115 - चिंता रहित होकर देख
1-116 - आत्म-ध्यान के बिना सुख सम्भव नहीं
1-117 - आत्म-ध्यानी के सुख के सामान सुख नहीं
1-118 - आत्म-ध्यानी को भगवान जैसा सुख
1-119 - मोक्ष अपने आप में
1-120 - राग-रंजित को मोक्ष-सुख नहीं
1-121 - राग और सुख एक साथ नहीं रह सकते
1-122 - भगवान आत्मा अनादि से
1-123-A - वन्द्य-वंदक भाव रहित
1-123-B - मन पर लगाम द्वारा मुक्ति प्राप्ति
2-001 - समभाव द्वारा सुख की प्राप्ति
2-002 - शिष्य द्वारा अनुरोध
2-003 - मोक्ष, मोक्ष का फल, मोक्ष का कारण करने की प्रतिज्ञा
2-004 - मोक्ष ही सुख
2-005 - तीन पुरुषार्थों की अपेक्षा मोक्ष पुरुषार्थ की उत्तमता
2-006 - मोक्ष तीन-लोक में उत्कृष्ट
2-007 - मोक्ष में अविनाशी सुख
2-008 - सभी ज्ञानियों का ध्येय मोक्ष
2-009 - मोक्ष के चिंतवन की प्रेरणा
2-010 - मोक्ष - परमात्म-प्राप्ति
2-011 - मोक्षफल - शास्वत सुख
2-012 - मोक्ष-मार्ग - निश्चय रत्नत्रय
2-013 - मोक्ष-मार्ग - रत्नत्रय परिणत आत्मा
2-014 - व्यवहार-रत्नत्रय की सार्थकता
2-015 - व्यवहार-सम्यक्त्व
2-016 - छह-द्रव्य
2-017 - द्रव्यों के नाम
2-018 - जीव का लक्षण
2-019 - पुद्गल, धर्म, अधर्म का लक्षण
2-020 - आकाश द्रव्य
2-021 - काल द्रव्य
2-022 - अखंड-प्रदेशी द्रव्य
2-023 - क्रिया-रहित द्रव्य
2-024 - द्रव्यों के प्रदेश
2-025 - एक जगह रहते हुए भी मिलते नहीं
श्रीब्रह्मदेव
!!
श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम:
!!
श्रीमद्-भगवत्योगीन्दु-देव-प्रणीत
श्री
परमात्मप्रकाश
मूल प्राकृत गाथा,
आभार :
श्रीब्रह्मदेव
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