
अरहंतभासियत्थं गणहरदेवेहिं गंथियं सम्मं
सुत्तत्थमग्गणत्थं सवणा साहंति परमत्थं ॥1॥
अर्हद्भाषितार्थं गणधरदेवै: ग्रथितं सम्यक् ।
सूत्रार्थमार्गणार्थं श्रमणा: साधयन्ति परमार्थम् ॥१॥
अरहंत-भासित ग्रथित-गणधर सूत्र से ही श्रमणजन ।
परमार्थ का साधन करें अध्ययन करो हे भव्यजन ॥१॥
अन्वयार्थ : [अरहन्तभासियत्थं] अरिहंत देव द्वारा प्रतिपादित अर्थमय, [गणहरदेवेहिं] गणधर देव द्वारा [सम्मं] सम्यक रूप से / पूर्वापरविरोधरहित [गंथियं] गुथित तथा [सुत्तत्थ] शास्त्र के [मग्गणत्थं] अर्थ को खोजने वाले, सूत्रों से [सवणा] श्रमण अपने [परमत्थं] परमार्थ को [साहंति] साधते है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
जो अरहंत सर्वज्ञ द्वारा भाषित है तथा गणधरदेवों ने अक्षरपद वाक्यमयी गूंथा है और सूत्र के अर्थ को जानने का ही जिसमें अर्थ-प्रयोजन है - ऐसे सूत्र से मुनि परमार्थ जो मोक्ष उसको साधते हैं । अन्य जो अक्षपाद, जैमिनि, कपिल, सुगत आदि छद्मस्थों के द्वारा रचे हुए कल्पित सूत्र हैं, उनसे परमार्थ की सिद्धि नहीं है, इसप्रकार आशय जानना ॥१॥
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