+ सूत्र-प्रवीण के संसार नाश -
सुत्तं हि जाणमाणो भवस्स भवणासणं च सो कुणदि
सूई जहा असुत्त णासदि सुत्तेण सहा णो वि ॥3॥
सूत्रे ज्ञायमान: भवस्य भवनाशनं च स: करोति ।
सूची यथा असूत्रा नश्यति सूत्रेण सह नापि ॥३॥
डोरा सहित सुइ नहीं खोती गिरे चाहे वन-भवन ।
संसार-सागर पार हों जिनसूत्र के ज्ञायक श्रमण ॥३॥
अन्वयार्थ : [भवस्स] जो भव्य [सुत्तं] सूत्रों / शास्त्रों को यथार्थ में [जाणमाणो] जानता है, मानो [सो] वही चतुर्गति रूप अपने [भव] संसार को [णासणं] नष्ट [कुणदि] करता है [जहा] जिस प्रकार [असुत्ता] डोरी के बिना [सुई] सुई [णासदि] खो जाती है उसी प्रकार [सुत्ते] सूत्रों / शास्त्रों [सहा] के साथ [णोवि] बिना भी अनभिज्ञ मनुष्य भी नष्ट / संसार में गुम हो जाता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

सूत्र का ज्ञाता हो वह संसार का नाश करता है, जैसे सूई डोरा सहित हो तो दृष्टिगोचर होकर मिल जावे, कभी भी नष्ट न हो और डोरे के बिना हो तो दीखे नहीं, नष्ट हो जाय - इसप्रकार जानना ॥३॥