+ उनकी प्रवृत्ति का विशेष -
जे बावीसपरीसह सहंति सत्तीसएहिं संजुत्त
ते होंति वंदणीया कम्मक्खयणिज्जरासाहू ॥12॥
ये द्वाविंशतिपरीषहान्‌ सहन्‍ते शक्तिशतै: संयुक्ता: ।
ते भवन्‍ति वन्‍दनीया: कर्मक्षयनिर्जरासाधव: ॥१२॥
निजशक्ति से सम्पन्न जो बाइस परीषह को सहें ।
अर कर्म क्षय वा निर्जरा सम्पन्न मुनिजन वंद्य हैं ॥१२॥
अन्वयार्थ : जो (मुनि) [वीसपरिसह] बाईस परिषह [सहंति] सहन करते है, [सत्तीसएहिं] सैकड़ों शक्ति [संजुत्ता] युक्त हैं [ते] वे [वंदणीया] वन्दनीय हैं, [कम्मक्खय] कर्मक्षय व [णिज्जरासाहू] निर्जरा करने मे कुशल हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जो बड़ी शक्ति के धारक साधु हैं, वे परीषहों को सहते हैं, परीषह आने पर अपने पद से च्युत नहीं होते हैं, उनके कर्मों की निर्जरा होती है, वे वंदने योग्य हैं ॥१२॥