
लिंगं इत्थीण हवदि भुंजइ पिंड सुएयकालम्मि
अज्जिय वि एक्कवत्था वत्थावरणेण भुंजेदि ॥22॥
लिङ्गं स्त्रीणां भवति भुङ्क्ते पिण्डं स्वेक काले ।
आर्या अपि एकवस्त्रा वस्त्रावरणेन भुङ्क्ते ॥२२॥
अर नारियों का लिंग तीजा एक पट धारण करें ।
वह नग्न ना हो दिवस में इकबार ही भोजन करें ॥२२॥
अन्वयार्थ : तीसरा [लिगं] लिंग [इत्थीणं] स्त्री का [हवदि] होता है इसकी धारक स्त्रीयां [एयकालम्मि] एक दिन में [पिडं] एकबार [भुंजइ] भोजन ग्रहण करतीं हैं । [अज्जिय वि] आर्यिका भी [एक्क वत्था] एक ही वस्त्र धारण करे और [वत्थावरणेण] वस्त्र के आवरण सहित [भुंजेइ] भोजन करे ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
स्त्री आर्यिका भी हो और क्षुल्लिका भी हो, वे दोनों ही भोजन तो दिन में एकबार ही करे, आर्यिका हो वह एक वस्त्र धारण किये हुए ही भोजन करे, नग्न नहीं हो । इसप्रकार तीसरा स्त्री का लिंग है ॥२२॥
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