+ स्त्रियों को दीक्षा नहीं है इसका कारण -
लिंगम्मि य इत्थीणं थणंतरे णाहिकक्खदेसेसु
भणिओ सुहुमो काओ तासिं कह होइ पव्वज्ज ॥24॥
लिङ्‍गे च स्त्रीणां स्तनान्‍तरे नाभिकक्षदेशेषु ।
भणित: सूक्ष्म: काय: तासां कथं भवति प्रव्रज्या ॥२४॥
नारियों की योनि नाभी काँख अर स्तनों में ।
जिन कहे हैं बहु जीव सूक्षम इसलिए दीक्षा न हो ॥२४॥
अन्वयार्थ : [इत्थीणं] स्त्रियों की [लिंगम्मि] योनि में, [यथणंतरे] स्तनों के बीच में वक्षस्थल, [णाहिकक्खदेसेसु] नाभि और कांख के क्षेत्र में [सुहुमोकाओ] सूक्ष्म शरीरी जीव [भणिओ] कहे गये है [तासं] अतः उनकी [पव्वज्जा] दिक्षा [कथं] कैसे [होइ] हो सकती है ?

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

स्त्रियों के योनि, स्तन, कांख, नाभि में पंचेन्द्रिय जीवों की उत्पत्ति निरन्तर कही है, इनके महाव्रतरूप दीक्षा कैसे हो ? महाव्रत कहे हैं वह उपचार से कहे हैं, परमार्थ से नहीं है, स्त्री अपने सामर्थ्य की हद्द को पहुँचकर व्रत धारण करती है, इस अपेक्षा से उपचार से महाव्रत कहे हैं ॥२४॥