
तं चेव गुणविसुद्धं जिणसम्मत्तं सुमुक्खठाणाए
जं चरइ णाणजुत्तं पढमं सम्मत्तचरणचारित्तं ॥8॥
तच्चैव गुणविशुद्धं जिनसम्यक्त्वं सुमोक्षस्थानाय ।
तत् चरति ज्ञानयुक्तं प्रथमं सम्यक्त्वचरणचारित्रम् ॥८॥
इन आठ गुण से शुद्ध सम्यक् मूलत: शिवथान है ।
सद्ज्ञानयुत आचरण यह सम्यक्चरण चारित्र है ॥८॥
अन्वयार्थ : [तं] उन निःशंकितादि [चेव गुण] गुणों से [विसुद्धं] विशुद्ध [जिणसम्मत्तं] जिनेन्द्र भगवान् के ऊपर श्रद्धा है, वह [सु] उत्तम [मुक्ख] मोक्ष [थाणाय] स्थान के लिए होता है [जं] जिसका [चरइ] आचरण कर प्रथम [सम्मत्तचरण] सम्यक्त्वचरण [चारित्तं] चारित्र होता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
सर्वज्ञभाषित तत्त्वार्थ की श्रद्धा नि:शंकित आदि गुण सहित, पच्चीस मल दोष रहित, ज्ञानवान आचरण करे उसको सम्यक्त्वाचरण चारित्र कहते हैं । वह मोक्ष की प्राप्ति के लिए होता है, क्योंकि मोक्षमार्ग में पहिले सम्यग्दर्शन कहा है, इसलिए मोक्षमार्ग में प्रधान यह ही है ॥८॥
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