+ पाँच इन्द्रियों के संवरण का स्वरूप -
अमणुण्णे य मणुण्णे सजीवदव्वे अजीवदव्वे य
ण करेदि रायदोसे पंचेंदियसंवरो भणिओ ॥29॥
अमनोज्ञे च मनोज्ञे सजीवद्रव्ये अजीवद्रव्ये च ।
न करोति रागद्वेषौ पञ्‍चेन्‍द्रियसंवर: भणित: ॥२९॥
सजीव हो या अजीव हो अमनोज्ञ हो या मनोज्ञ हो ।
ना करे उनमें राग-रुस पंच इन्द्रियाँ, संवर कहा ॥२९॥
अन्वयार्थ : [मणुण्णे] मनोज्ञ (इष्ट) [य] और [अमणुण्णे] अमनोज्ञ (अनिष्ट) [सजीवदव्वे] चेतन द्रव्यों [य] तथा [अजीवदव्वे] अचेतन द्रव्यों में [रायदोसे] रागद्वेष [ण करेइ] नही करना [पंचेदियसंवरो] पंचेन्द्रिय संवर (इष्ट विषयों में राग और अनिष्ट में द्वेष नही रहना पंचेन्द्रिय संवर/दमन) [भणिओ] कहा है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

इन्द्रियगोचर जीव अजीव द्रव्य है, ये इन्द्रियों के ग्रहण में आते हैं, इनमें यह प्राणी किसी को इष्ट मानकर राग करता है और किसी को अनिष्ट मानकर द्वेष करता है, इसप्रकार रागद्वेष मुनि नहीं करते हैं, उनके संयमचरण चारित्र होता है ॥२९॥