
साहंति जं महल्ला आयरियं जं महल्लपुव्वेहिं
जं च महल्लाणि तदो महव्वया इत्तहे याइं ॥31॥
साधयन्ति यन्महान्त: आचरितं यत् महत्पूर्वै: ।
यच्च महन्ति तत: महाव्रतानि एतस्माद्धेतो: तानि ॥३१॥
ये महाव्रत निष्पाप हैं अर स्वयं से ही महान हैं ।
पूर्व में साधे महाजन आज भी हैं साधते ॥३१॥
अन्वयार्थ : [जं महल्ला] क्योकि महापुरुष इन्हें [साहंति] साधते हैं, [महल्लपुव्वेहिं आयरियं] पूर्ववर्ती महापुरुषों ने इनका आचरण किया है, [च जं महल्लाणि] और क्योंकि स्वयं से महान है, [तदो ताइं] इसलिए उन्हें [महल्लया इत्तेहे] महाव्रत कहते हैं ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
जिनका बड़े पुरुष आचरण करें और आप निर्दोष हो वे ही बड़े कहलाते हैं, इसप्रकार इन पाँच व्रतों को महाव्रत संज्ञा है ॥३१॥
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