+ ब्रह्मचर्य महाव्रत की भावना -
महिलालोयणपुव्वरइसरणसंसत्तवसहिविकहाहिं
पुट्ठियरसेहिं विरओ भावण पंचावि तुरियम्मि ॥35॥
महिलालोकनपूर्वरतिस्मरणसंसक्तवसतिविकथाभि: ।
पौष्टिकरसै: विरत: भावना: पञ्‍चापि तुर्ये ॥३५॥
त्याग हो आहार पौष्टिक आवास महिलावासमय ।
भोगस्मरण महिलावलोकन त्याग हो विकथा कथन ॥३५॥
अन्वयार्थ : [महिलाअलोयण] राग सहित स्त्रियों को देखना, [पुव्वरइसरण] पूर्व में भोगे भोगों का स्मरण, [ससत्तवसहि] स्त्रियों से संसक्त वसतिका में रहना, [विकहाहि] स्त्रियों की कथा और [पुट्ठियरसेहिं] पौष्टिक रसों का सेवन से [वींरओ] विरति ब्रह्मचर्यव्रत की [पंचावि] पांच [भावण] भावनायें हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

कामविकार के निमित्तें से ब्रह्मचर्यव्रत भंग होता है, इसलिए स्त्रियों को रागभाव से देखना इत्यादि निमित्त कहे, इनसे विरक्त रहना, प्रसंग नहीं करना, इससे ब्रह्मचर्य महाव्रत दृढ़ रहता है ॥३५॥