
दंसणणाणचरित्तं तिण्णि वि जाणेह परमसद्धाए
जं जाणिऊण जोई अइरेण लहंति णिव्वाणं ॥40॥
दर्शनज्ञानचरित्रं त्रीण्यपि जानीहि परमश्रद्धया ।
यत् ज्ञात्वा योगिन: अचिरेण लभन्ते निर्वाणम् ॥४०॥
तू जान श्रद्धाभाव से उन चरण-दर्शन-ज्ञान को ।
अतिशीघ्र पाते मुक्ति योगी अरे जिनको जानकर ॥४०॥
अन्वयार्थ : [दंसणणाणचरित्तं] सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र [तिण्णिवि] तीनों को [परमसद्धाए] परमश्रद्धा से [जाणेह] जानो, [जं जाणिऊण] जिनको जानकर [जोइ] योगीजन [अइरेण] अल्प-काल में [णिण्वाणं] निर्वाण को [लहंति] प्राप्त करते हैं ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र त्रयात्मक मोक्षमार्ग है, इसको श्रद्धापूर्वक जानने का उपदेश है, क्योंकि इसको जानने से मुनियों को मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥४०॥
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