
णाणगुणेहिं विहीणा ण लहंते ते सुइच्छियं लाहं
इय णाउं गुणदोसं तं सण्णाणं वियाणेहिं ॥42॥
ज्ञानगुणै: विहीना न लभते ते स्विष्टं लाभं ।
इति ज्ञात्वा गुणदोषौ तत् सद्ज्ञानं विजानीहि ॥४२॥
ज्ञानगुण से हीन इच्छितलाभ को ना प्राप्त हों ।
यह जान जानो ज्ञान को गुणदोष को पहिचानने ॥४२॥
अन्वयार्थ : [णाणगुणेहिं विहिणा] ज्ञानगुण से हीन [सुइच्छायं] अत्यंत इष्ट के [लाहं लहंते ण] लाभ से लाभान्वित नहीं होते [इय गुणदोसं] अत: गुण-दोषों को [णाउं तं सण्णाणं] जानकर उस सम्यज्ञान को [वियाणेहि] भली प्रकार जानो ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
ज्ञान के बिना गुण दोष का ज्ञान नहीं होता है तब अपनी इष्ट तथा अनिष्ट वस्तु को नहीं जानता है, तब इष्ट वस्तु का लाभ नहीं होता है इसलिए सम्यग्ज्ञान ही से गुण-दोष जानेजाते हैं, क्योंकि सम्यग्ज्ञान के बिना हेय-उपादेय वस्तुओं का जानना नहीं होता है और हेय-उपोदय को जाने बिना सम्यक्चारित्र नहीं होता है । इसलिए ज्ञान ही को चारित्र से प्रधान कहा है ॥४२॥
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