
जचंदछाबडा :
इस चारित्रपाहुड़ को बांचना, पढ़ना, धारण करना, बारम्बार भाना, अभ्यास करना - यह उपदेश है, इससे चारित्र का स्वरूप जानकर धारण करने की रुचि हो, अंगीकार करे तब चार गतिरूप संसार के दु:ख से रहित होकर निर्वाण को प्राप्त हो, फिर संसार में जन्म धारण नहीं करे, इसलिए जो कल्याण को चाहते हैं, वे इसप्रकार करो ॥४५॥ (छप्पय)
ऐसे सम्यक्त्वचरणचारित्र और संयमचरणचारित्र दो प्रकार के चारित्र का स्वरूप इस प्राभृत में कहा ।चारित दोय प्रकार देव जिनवर ने भाख्या । समकित संयम चरण ज्ञानपूरव तिस राख्या ॥ जे नर सरधावान याहि धारैं विधि सेती । निश्चय अर व्यवहार रीति आगम में जेती ॥ (दोहा) जिनभाषित चारित्रकूं जे पालैं मुनिराज । तिनि के चरण नमूं सदा पाऊँ तिनि गुणसाज ॥१॥ जब जगधन्धा सब मेटि कैं निजस्वरूप में थिर रहै । तब अष्टकर्मकूं नाशि कै अविनाशी शिव कूं लहै ॥२॥ (इति श्रीकुन्दकुन्दस्वामि विरचित चारित्रप्राभृत की पण्डित जयचन्द्र छाबड़ा कृत देशभाषावचनिका का हिन्दी भाषानुवाद समाप्त ॥३॥) |