+ तीर्थ का स्वरूप -
वयसम्मत्तविसुद्धे पंचेंदियसंजदे णिरावेक्खे
ण्हाएउ मुणी तित्थे, दिक्खासिक्खासुण्हाणेण ॥26॥
व्रतसम्यक्त्वविशुद्धे पञ्‍चेन्‍द्रियसंयते निरपेक्षे ।
स्नातु मुनि: तीर्थे दीक्षाशिक्षासुस्नानेन ॥२६॥
सम्यक्त्वव्रत से शुद्ध संवर सहित अर इन्द्रियजयी ।
निरपेक्ष आतमतीर्थ में स्नान कर परिशुद्ध हों ॥२६॥
अन्वयार्थ : [वय] व्रत [सम्मत्त] सम्यक्त्व से [विसुद्धे] विशुद्ध और [पंचदिय] पाँच इन्द्रियों से [संजदे] संयत अर्थात्‌ संवरसहित तथा [णिरावेक्खे] निरपेक्ष (ख्याति, लाभ, पूजादिक इस लोक के फल की तथा परलोक में स्वर्गादिक के भोगों की अपेक्षा से रहित) [मुणी] मुनि [तित्थेप] आत्म-स्वरूप तीर्थ में [दिक्खासिक्खा] दीक्षा-शिक्षा-रूप [सुण्हाणेण] उत्तम स्नान से [ण्हाएउ] नहाओ ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

तत्त्वार्थ-श्रद्धान-लक्षण-सहित, पाँच महाव्रत से शुद्ध और पाँच इन्द्रियों के विषयों से विरक्त, इस लोक-परलोक में विषय-भोगों की वांछा से रहित ऐसे निर्मल आत्मा के स्वभावरूप तीर्थ में स्नान करने से पवित्र होते हैं, ऐसी प्रेरणा करते हैं ॥२६॥