
दंसण अणंत णाणे मोक्खो णट्ठट्ठकम्मबंधेण
णिरुवमगुणमारूढो अरहंतो एरिसो होइ ॥29॥
दर्शनं अनन्तं ज्ञानं मोक्ष: नष्टानष्टकर्मबन्धेन ।
निरुपमगुणमारूढ: अर्हन् ईदृशो भवति ॥२९॥
अनंत दर्शन ज्ञानयुत आरूढ़ अनुपम गुणों में ।
कर्माष्ट बंधन मुक्त जो वे ही अरे अरिहंत हैं ॥२९॥
अन्वयार्थ : [दंसणं अणंताणाणे] अनन्त-दर्शन, अनन्त-ज्ञान से [णट्ठटट्ठकम्मबंधेण] अष्ट-कर्मों का बंध नष्ट होने होने से, [मोक्खो] भाव-मोक्ष प्राप्त, [णिरुवम गुणमारूढो] अनुपम गुणों से सहित [एरिसो अरहंतो होई] ऐसे अरिहंत होते हैं ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
केवल नाममात्र ही अरंहत हो उसको अरहंत नहीं कहते हैं । इसप्रकार के गुणों से सहित हो उसको अरहंत कहते हैं ।
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