+ स्थापना द्वारा अरहंत का वर्णन -
गुणठाणमग्गणेहिं य पज्जत्तीपाणजीवठाणेहिं
ठावण पंचविहेहिं पणयव्वा अरहपुरिसस्स ॥31॥
गुणस्थानमार्गणाभि: च पर्याप्तिप्राणजीवस्थानै: ।
स्थापना पञ्‍चविधै: प्रणेतव्या अर्हत्पुरुषस्य ॥३१॥
गुणथान मार्गणथान जीवस्थान अर पर्याप्ति से ।
और प्राणों से करो अरहंत की स्थापना ॥३१॥
अन्वयार्थ : [गुणठाणमग्गणेहिं] गुणस्थान, मार्गणा, [य] और [पज्जत्तीपाण] पर्याप्ति, प्राण [जीवठाणेहिं] जीवस्थान, [पंचविहेहिँ] पांच प्रकार से [अरूहपुरीसस्स] अरिहंत भगवान् की [ठावण] स्थापना का [पणयव्वा] वर्णन करना चाहिये ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

स्थापना-निक्षेप में काष्ठ-पाषाणादिक में संकल्प करना कहा है सो यहाँ प्रधान नहीं है । यहाँ निश्चय की प्रधानता से कथन है । यहाँ गुणस्थानादिक से अरहंत का स्थापन कहा है ॥३१॥