+ पर्याप्ति में अरिहंत की स्थापना -
आहारो य सरीरो इंदियमणआणपाणभासा य
पज्जत्तिगुणसमिद्धो उत्तमदेवो हवइ अरहो ॥34॥
आहार: च शरीरं इन्द्रियमनआनप्राणभाषा: च ।
पर्याप्तिगुणसमृद्ध: उत्तमदेव: भवति अर्हन्‌ ॥३४॥
आहार तन मन इन्द्रि श्वासोच्छ्‌वास भाषा छहों इन ।
पर्याप्तियों से सहित उत्तम देव ही अरहंत हैं ॥३४॥
आहार तन मन इन्द्रि श्वासोच्छ्वास भाषा छहों इन ।
पर्याप्तियों से सहित उत्तम देव ही अरहंत हैं ॥३४॥
अन्वयार्थ : [आहारो] आहार, [य] और [सरीरो] शरीर, [तह] तथा [इंदिय] इन्द्रिय, [आणपाण] श्वासोच्छ्वास, [भासा] भाषा, [य] और मन; -- इसप्रकार छह पर्याप्ति हैं, इस [पज्जत्तिगुण] पर्याप्ति गुण द्वारा [समिद्धो] समृद्ध अर्थात् युक्त [उत्तमदेवो] उत्तम देव [अरहो] अरहंत [हवइ] होते हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

पर्याप्तिका स्वरूप इसप्रकार है—जो जीव एक अन्य पर्यायको छोड़कर अन्य पर्यायमें जावे तब विग्रह गतिमें तीन समय उत्कृष्ट बीचमें रहे, पीछे सैनी पंचेन्द्रियमें उत्पन्न हो । वहाँ तीन जातिकी वर्गणाका ग्रहण करे—आहारवर्गणा, भाषावर्गणा, मनोवर्गणा, इसप्रकार ग्रहण करके 'आहार' जातिकी वर्गणासे तो आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास इसप्रकार चार पर्याप्ति अन्तर्मुहूर्त कालमें पूर्ण करे, तत्पश्चात् भाषाजाति मनोजातिकी वर्गणासे अन्तर्मुहूर्तमें ही भाषा, मनःपर्याप्ति पूर्ण करे, इसप्रकार छहों पर्याप्ति अन्तर्मुहूर्तमें पूर्ण करता है, तत्पश्चात् आयुपर्यन्त पर्याप्त ही कहलाता है और नौकर्मवर्गणाका ग्रहण करता ही रहता है । यहाँ आहार नाम कवलाहारका नहीं जानना । इसप्रकार तेरहवें गुणस्थानमें भी अरहंतके पर्याप्त पूर्ण ही है, इसप्रकार पर्याप्ति द्वारा अरहंतकी स्थापना है ।