+ द्रव्य की प्रधानता से अरहंत का निरूपण -
जरवाहिदुक्खरहियं आहारणिहारवज्जियं विमलं
सिंहाण खेले सेओ णत्थि दुगुंछा य दोसो य ॥37॥
दस पाणा पज्जती अट्ठसहस्सा य लक्खणा भणिया
गोखीरसंखधवलं मंसं रुहिरं च सव्वंगे ॥38॥
एरिसगुणेहिं सव्वं अइसयवंतं सुपरिमलामोयं
ओरालियं च कायं णायव्वं अरहपुरिसस्स ॥39॥
जराव्याधिदु:खरहित: आहारनीहारवर्जित: विमल: ।
सिंहाण: खेल: स्वेद: नास्ति दुर्गन्ध च दोष: च ॥३७॥
दश प्राणा: पर्याप्तय: अष्टसहस्राणि च लक्षणानि भणितानि ।
गोक्षीरशङ्‍खधवलं मांसं रुधिरं च सर्वाङ्‍गे ॥३८॥
ईदृशगुणै: सर्व: अतिशयवान्‌ सुपरिमलामोद: ।
औदारिकश्च काय: अर्हत्पुरुषस्य ज्ञातव्य: ॥३९॥
व्याधी बुढ़ापा श्वेद मल आहार अर नीहार से ।
थूक से दुर्गन्ध से मल-मूत्र से वे रहित हैं ॥३७॥
अठ सहस लक्षण सहित हैं अर रक्त है गोक्षीर सम ।
दश प्राण पर्याप्ती सहित सर्वांग सुन्दर देह है ॥३८॥
इस तरह अतिशयवान निर्मल गुणों से सयुक्त हैं ।
अर परम औदारिक श्री अरिहंत की नरदेह है ॥३९॥
अन्वयार्थ : अरहंत पुरुष के औदारिक काय इसप्रकार होता है, जो [जर] बुढापा, [वाहि] व्याधि और रोग संबंधी [दुक्खरहियं] दु:ख से रहित है, [आहारणिहार] आहार, मल-मूत्र विसर्जन से [वज्जियं] रहित है, [विमलं] मलमूत्र रहित है; [सिंहाण] श्लेष्म, [खेल] थूक-कफ, [सेओ] पसेव और दुर्गन्ध अर्थात्‌ जुगुप्सा, [दुगंछा] ग्लानि [य] और दुर्गन्धादि [दोसो] दोष उसमें [णत्थि] नहीं है ॥३७॥
[दसपाणा] दस तो उसमें प्राण होते हैं वे द्रव्यप्राण हैं, [पज्जती] पूर्ण पर्याप्ति है, [अट्ठसहस्सा] एक हजार आठ [लक्खणा] लक्षण [भणिया] कहे हैं और [सव्वंगे] सर्वांग में [गोखीर] गाय के दूध तथा [संख] शंख जैसा [धवलंमंसं] धवल [रूहिरं] रुधिर और [मंसं] मांस है ॥३८॥
[एरिस] इसप्रकार [गुणेहिं] गुणों से संयुक्त [सव्वं] सर्व ही देह [अइसयवंतं] अतिशयसहित [सुपरिमलामोयं] उत्तम सुगन्ध से परिपूर्ण है, आमोद अर्थात्‌ सुगंध जिसमें इसप्रकार [अरहपुरिसस्स] अरहंत पुरुष [ओरालियं] औदारिक [कायं] देह के [णायव्वं] जानो ॥३९॥

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

यहाँ द्रव्यनिक्षेप नहीं समझना । आत्मा से जुदा ही देह की प्रधानता से 'द्रव्य अरहंत' का वर्णन है ॥३७-३८-३९॥

इसप्रकार द्रव्य अरहंत का वर्णन किया ।