+ प्रव्रज्या का स्वरूप -
गिहगंथमोहमुक्का बावीसपरीसहा जियकषाया
पावारंभविमुक्का पव्वज्ज एरिसा भणिया ॥45॥
गृहग्रन्‍थमोहमुक्ता द्वाविंशतिपरीषहा जितकषाया ।
पापारम्‍भविमुक्ता प्रव्रज्या ईदृशी भणिता ॥४५॥
परिषहजयी जितकषायी निर्ग्रन्थ है निर्मोह है ।
है मुक्त पापारंभ से ऐसी प्रव्रज्या जिन कही ॥४५॥
अन्वयार्थ : [गिह] गृह (घर) और [गन्थ] ग्रंथ (परिग्रह) इन दोनों से मुनि तो [मोहमुक्का] मोह / ममत्व / इष्ट-अनिष्ट बुद्धि से रहित ही है, जिनमें [वावीसपरीसहा] बाईस परीषहों का सहना होता है, [जियकसाया] कषायों को जीतते हैं और [पावरंभ] पापरूप आरंभ से [विमुक्का] रहित हैं, [एरिसा] इसप्रकार [पव्वज्जा] प्रव्रज्या जिनेश्वरदेव ने [भणिया] कही है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जैनदीक्षा में कुछ भी परिग्रह नहीं, सर्व संसार का मोह नहीं, जिसमें बाईस परीषहों का सहना तथा कषायों का जीतना पाया जाता है और पापारंभ का अभाव होता है । इसप्रकार की दीक्षा अन्यमत में नहीं है ॥४५॥