तिलतुसमत्तणिमित्तसम बाहिरग्गंधसंगहो णत्थि
पव्वज्ज हवइ एसा जह भणिया सव्वदरसीहिं ॥55॥
तिलतुषमात्रनिमित्तसम: बाह्यग्रन्‍थसङ्‍ग्रह: नास्ति ।
प्रव्रज्या भवति एषा यथा भणिता सर्वदर्शिभि: ॥५५॥
जिसमें परिग्रह नहीं अन्तर्बाह्य तिलतुषमात्र भी ।
सर्वज्ञ के जिनमार्ग में जिनप्रव्रज्या ऐसी कही ॥५५॥
अन्वयार्थ : [तिलओसत्त] तिल-तुष मात्र सत्व का [निमित्तं] कारण इसप्रकार भावरूप इच्छा अर्थात्‌ अंतरंग परिग्रह और तिल-तुष [समवाहिर] बराबर भी बाह्य [गंथ] परिग्रह का [संगहो] संग्रह मुनि के [णत्थि] नहीं है, [एसा] वही [पावज्ज] दीक्षा [हवइ] है [जह] जैसी [सव्वदरिसीहिं] सर्वदर्शी /सर्वज्ञ जिनेन्द्र भगवान ने [भणिय] कही है ।

  जचंदछाबडा