+ नरकगति के दुःख -
सत्तसु णरयावासे दारुणभीमाइं असहणीयाइं
भुताइं सुइरकालं दुःक्खाइं णिरंतरं सहियं ॥9॥
सप्तसु नरकावासेषु दारुणभीषणानि असहनीयानि ।
भुक्तानि सुचिरकालं दुःखानि निरंतरं सोढानि ॥९॥
इन सात नरकों में सतत चिरकाल तक हे आत्मन् ।
दारुण भयंकर अर असह्य महान दु:ख तूने सहे ॥९॥
अन्वयार्थ : हे जीव ! तूने [सत्तसु] सात [णरयावासे] नरकभूमियों के नरक-आवास बिलों में [दारुणभीमाइं] दारुण (तीव्र) तथा भयानक और [असहणीयाइं] असहनीय [दुःक्खाइं] दुःखों को [सुइरकालं] बहुत दीर्घ काल तक [णिरंतरं] निरन्तर ही [भुताइं] भोगे और [सहियं] सहे ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

नरक की पृथ्वी सात हैं, उनमें बिल बहुत हैं, उनमें दस हजार वर्षो से लगाकर तथा एक सागर से लगाकर तेतीस सागर तक आयु है जहाँ आयुपर्यन्त अति तीव्र दुःख यह जीव अनन्तकाल से सहता आया है ॥९॥