
जचंदछाबडा :
आत्मा का श्रद्धान-ज्ञान-आचरण निश्चयरत्नत्रय है और बाह्य में इसका व्यवहार-जीव अजीवादि तत्त्वों का श्रद्धान, तथा जानना और परद्रव्य परभाव का त्याग करना इसप्रकार निश्चय-व्यवहारस्वरूप रत्नत्रय मोक्ष का मार्ग है । वहाँ निश्चय तो प्रधान है, इसके बिना व्यवहार संसारस्वरूप ही है । व्यवहार है वह निश्चय का साधनस्वरूप है, इसके बिना निश्चय की प्राप्ति नहीं है और निश्चय की प्राप्ति हो जाने के बाद व्यवहार कुछ नहीं है इसप्रकार जानना चाहिये ॥३१॥ |