
जचंदछाबडा :
द्रव्य-लिंग धारण किया और उसमें परम्परा से भी भाव-लिंग की प्राप्ति न हुई इसलिये द्रव्य-लिंग निष्फल गया, मुक्ति की प्राप्ति नहीं हुई, संसार में ही भ्रमण किया । यहाँ आशय इसप्रकार है कि -- द्रव्य-लिंग है वह भाव-लिंग का साधन है, परन्तु काललब्धि बिना द्रव्यलिंग धारण करने पर भी भाव-लिंग की प्राप्ति नहीं होती है, इसलिये द्रव्य-लिंग निष्फल जाता है । इसप्रकार मोक्ष-मार्ग में प्रधान भाव-लिंग ही है । यहाँ कोई कहे कि इसप्रकार है तो द्रव्य-लिंग पहिले क्यों धारण करें ? उसको कहते हैं कि -- इसप्रकार माने तो व्यवहार का लोप होता है, इसलिये इसप्रकार मानना जो द्रव्य-लिंग पहिले धारण करना, इसप्रकार न जानना कि इसी से सिद्धि है । भावलिंग को प्रधान मानकर उसके सन्मुख उपयोग रखना, द्रव्य-लिंग को यत्नपूर्वक साधना, इसप्रकार का श्रद्धान भला है ॥३४॥ |