
जचंदछाबडा :
द्रव्य-लिंग धारण कर कुछ तप करे, उससे कुछ सामर्थ्य बढ़े, तब कुछ कारण पाकर क्रोध से अपना और दूसरे का उपद्रव करने का कारण बनावे, इसलिये द्रव्य-लिंग भावसहित धारण करना ही श्रेष्ठ है और केवल द्रव्य-लिंग तो उपद्रव का कारण होता है । इसका उदाहरण बाहु मुनि का बताया । उसकी कथा ऐसे है -- दक्षिण दिशा में कुम्भकारकटक नगर में दण्डक नाम का राजा था । उसके बालक नाम का मंत्री था । वहाँ अभिनन्दन आदि पांच सौ मुनि आये, उनमें एक खंडक नाम के मुनि थे । उन्होंने बालक नाम के मंत्री को वाद में जीत लिया, तब मंत्री ने क्रोध करके एक भाँड को मुनि का रूप कराकर राजा की रानी सुव्रता के साथ क्रीडा़ करते हुए राजा को दिखा दिया और कहा कि देखो ! राजा के ऐसी भक्ति है कि जो अपनी स्त्री भी दिगम्बर को क्रीडा़ करने के लिये दे दी है । तब राजा ने दिगम्बरों पर क्रोध करके पाँच सौ मुनियों को घानी में पिलवाया । वे मुनि उपसर्ग सहकर परम-समाधि में सिद्धि को प्राप्त हुए । फिर उस नगर में बाहु नाम के एक मुनि आये । उनको लोगों ने मना किया कि यहाँ का राजा दुष्ट है इसलिये आप नगर में प्रवेश मत करो । पहिले पाँच सौ मुनियों को घानी में पेल दिया है, वह आपका भी वही हाल करेगा । तब लोगों के वचनों से बाहु मुनि को क्रोध उत्पन्न हुआ, अशुभ तैजस समुद्घात से राजा को मंत्री सहित और सब नगर को भस्म कर दिया । राजा और मंत्री सातवें-नरक रौरव नामक बिल में गिरे, वह बाहु मुनि भी मरकर रौरव बिल में गिरे । इसप्रकार द्रव्य-लिंग में भाव के दोष से उपद्रव होते हैं, इसलिये भाव-लिंग का प्रधान उपदेश है ॥४६॥ |