+ भावलिंग का निरूपण करते हैं -
देहादिसंगरहिओ माणकसाएहिं सयलपरिचत्तो
अप्पा अप्पम्मि रओ स भावलिंगी हवे साहू ॥56॥
देहादिसंगरहितः मानकषायैः सकलपरित्यक्तः
आत्मा आत्मनि रतः स भावलिंगी भवेत् साधु ॥५६॥
देहादि के संग से रहित अर रहित मान कषाय से ।
अर आतमारत सदा ही जो भावलिंगी श्रमण वह ॥५६॥
अन्वयार्थ : भावलिंगी साधु ऐसा होता है -- देहादिक परिग्रहों से रहित होता है तथा मान कषाय से रहित होता है और आत्मा में लीन होता है, वही आत्मा भाव-लिंगी है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

आत्मा के स्वाभाविक परिणाम को भाव कहते हैं उस--रूप लिंग (चिह्न), लक्षण तथा रूप हो वह भाव-लिंग है । आत्मा अमूर्तिक चेतनारूप है, उसका परिणाम दर्शन ज्ञान है । उसमें कर्म के निमित्त से (--पराश्रय करने से) बाह्य तो शरीरादिक मूर्तिक पदार्थ का संबंध है और अंतरंग मिथ्यात्व और रागद्वेष आदि कषायों का भाव है, इसलिये कहते हैं कि :-

बाह्य तो देहादिक परिग्रह से रहित और अंतरंग रागादिक परिणाम में अहंकाररूप मान-कषाय, पर-भावों में अपनापन मानना इस भाव से रहित हो और अपने दर्शन-ज्ञानरूप चेतनाभाव में लीन हो वह भाव-लिंग है, जिसको इसप्रकार के भाव हों वह भाव-लिंगी साधु है ॥५६॥