
जचंदछाबडा :
आत्मा के स्वाभाविक परिणाम को भाव कहते हैं उस--रूप लिंग (चिह्न), लक्षण तथा रूप हो वह भाव-लिंग है । आत्मा अमूर्तिक चेतनारूप है, उसका परिणाम दर्शन ज्ञान है । उसमें कर्म के निमित्त से (--पराश्रय करने से) बाह्य तो शरीरादिक मूर्तिक पदार्थ का संबंध है और अंतरंग मिथ्यात्व और रागद्वेष आदि कषायों का भाव है, इसलिये कहते हैं कि :- बाह्य तो देहादिक परिग्रह से रहित और अंतरंग रागादिक परिणाम में अहंकाररूप मान-कषाय, पर-भावों में अपनापन मानना इस भाव से रहित हो और अपने दर्शन-ज्ञानरूप चेतनाभाव में लीन हो वह भाव-लिंग है, जिसको इसप्रकार के भाव हों वह भाव-लिंगी साधु है ॥५६॥ |