
आदा खु मज्झ णाणे आदा मे दंसणे चरित्ते य
आदा पच्चक्खाणे आदा मे संवरे जोगे ॥58॥
आत्मा खलु मम ज्ञाने आत्मा मे दर्शन चरित्रे च
आत्मा प्रत्याख्याने आत्मा मे संवरे योगे ॥५८॥
निज ज्ञान में है आतमा दर्शन चरण में आतमा ।
और संवर योग प्रत्याख्यान में है आतमा ॥५८॥
अन्वयार्थ : भावलिंगी मुनि विचारते हैं कि -- मेरे ज्ञानभाव प्रकट है, उसमें आत्मा की ही भावना है, ज्ञान कोई भिन्न वस्तु नहीं है, ज्ञान है वह आत्मा ही है, इसप्रकार ही दर्शन में भी आत्मा ही है । ज्ञान में स्थिर रहना चारित्र है, इसमें भी आत्मा ही है । प्रत्याख्यान आगामी पर-द्रव्य का सम्बन्ध छोड़ना है, इस भाव में भी आत्मा ही है, संवर ज्ञान-रूप रहना और परद्रव्य के भाव-रूप न परिणमना है, इस भाव में भी मेरा आत्मा ही है, और योग का अर्थ एकाग्र-चिंता-रूप समाधि-ध्यान है, इस भाव में भी मेरा आत्मा ही है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
ज्ञानादिक कुछ भिन्न पदार्थ तो हैं नहीं, आत्मा के ही भाव हैं, संज्ञा, संख्या, लक्षण और प्रयोजन के भेद से भिन्न कहते हैं, वहां अभेद-दृष्टि से देखें तो ये सब भाव आत्मा ही हैं इसलिये भाव-लिंगी मुनि के अभेद अनुभव में विकल्प नहीं है, अतः निर्विकल्प अनुभव से सिद्धि है यह जानकर इसप्रकार करता है ॥५८॥
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