
जचंदछाबडा :
रस, रूप, गंध, शब्द ये तो पुद्गल के गुण हैं, इनका निषेधरूप जीव कहा; अव्यक्त अलिंगग्रहण अनिर्दिष्ट-संस्थान कहा, इसप्रकार ये भी पुद्गल के स्वभाव की अपेक्षा से निषेधरूप ही जीव कहा और चेतना गुण कहा तो यह जीव का विधिरूप कहा । निषेध अपेक्षा तो वचन के अगोचर जानना और विधि अपेक्षा स्वसंवेदनगोचर जानना । इसप्रकार जीव का स्वरूप जानकर अनुभवगोचर करना । यह गाथा समयसारमें ४६, प्रवचनसारमें १७२, नियमसारमें ४६, पंचास्तिकाय में १२७, धवला टीका पु० ३ पृ० २, लघु द्रव्यसंग्रह गाथा ५ आदि में भी है । इसका व्याख्यान टीकाकार ने विशेष कहा है वह वहाँ से जानना चाहिये ॥६४॥ |