
जचंदछाबडा :
मोक्ष-मार्ग में एकदेश, सर्वदेश व्रतों की प्रवृत्तिरूप मुनि-श्रावकपना है, उन दोनों का कारणभूत निश्चय सम्यग्दर्शनादिक भाव हैं । भाव बिना व्रत-क्रिया की कथनी कुछ कार्यकारी नहीं है, इसरलिये ऐसा उपदेश है कि भाव बिना पढ़ने-सुनने आदि से क्या होता है ? केवल खेदमात्र है, इसलिये भाव-सहित जो करो वह सफल है । यहाँ ऐसा आशय है कि कोइ जाने कि-पढ़ना-सुनना ही ज्ञान है तो इसप्रकार नहीं है, पढ़कर-सुनकर आपको ज्ञान-स्वरूप जानकर अनुभव करे तब भाव जाना जाता है, इसलिये बारबार भावना से भाव लगाने पर ही सिद्धि है ॥६६॥ |