+ शुद्ध भाव ही स्वर्ग-मोक्ष का कारण है, मलिनभाव संसार का कारण है -
भावो वि दिव्वसिवसुक्खभायणो भाववज्जिओ सवणो
कम्ममलमलिणचित्तो तिरियालयभायणो पावो ॥74॥
भावः अपि दिव्यशिवसौख्यभाजनं भाववर्जितः श्रमणः
कर्ममलमलिनचित्तः तिर्यगालयभाजनं पापः ॥७४॥
हो भाव से अपवर्ग एवं भाव से ही स्वर्ग हो ।
पर मलिनमन अर भाव विरहित श्रमण तो तिर्यंच हो ॥७४॥
अन्वयार्थ : भाव ही स्वर्ग-मोक्ष का कारण है, और भाव-रहित श्रमण पाप-स्वरूप है, तिर्यंचगति का स्थान है तथा कर्म-मल से मलिन चित्तवाला है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

भाव से शुद्ध है वह तो स्वर्ग-मोक्ष का पात्र है और भाव से मलिन है वह तिर्यंचगति में निवास करता है ॥७४॥