
जचंदछाबडा :
भगवान ने भाव तीन प्रकार के कहे हैं- १ शुभ, २ अशुभ और ३ शुद्ध । अशुभ तो आर्त्त व रौद्र ध्यान हैं वे तो अति मलिन हैं, त्याज्य ही हैं । धर्म-ध्यान शुभ है, इसप्रकार यह कथंचित् उपादेय है इससे मंद-कषायरूप विशुद्ध भाव की प्राप्ति है । शुद्ध भाव है वह सर्वथा उपादेय है क्योंकि यह आत्मा का स्वरूप ही है । इसप्रकार हेय, उपादेय जानकर त्याग और ग्रहण करना चाहिये, इसीलिये ऐसा कहा है कि जो कल्याणकारी हो वह अंगीकार करना यह जिनदेव का उपदेश है ॥७७॥ |