
जचंदछाबडा :
यहाँ लिंग द्रव्य / भाव से दो प्रकार का है । द्रव्य तो बाह्य त्याग अपेक्षा है जिसमें पाँच प्रकार के वस्त्र का त्याग है, वे पाँच प्रकार ऐसे हैं --
भूमि पर सोना, बैठना इसमें काष्ठ-तृण भी गिन लेना । इन्द्रिय और मन को वश में करना, छह-काय के जीवों की रक्षा करना -- इसप्रकार दो प्रकार का संयम है । भिक्षा-भोजन करना जिसमें कृत, कारित, अनुमोदना का दोष न लगे, छियालीस दोष टले, बत्तीस अंतराय टले ऐसी विधि के अनुसार आहार करे । इसप्रकार तो बाह्य-लिंग है और पहिले कहा वैसे हो वह भाव-लिंग है, इसप्रकार दो प्रकार का शुद्ध जिन-लिंग कहा है, अन्य प्रकार श्वेताम्बरादिक कहते हैं वह जिनलिंग नहीं है ॥८१॥ |