+ द्रव्य-भावरूप सामान्यरूप से जिनलिंग का स्वरूप -
पंचविहचेलचायं खिदिसयणं दुविहसंजमं भिक्खू
भावं भावियपुव्वं जिणलिंगं णिम्मलं सुद्धं ॥81॥
पंचविधचेलत्यागं क्षितिशयनं द्विविधसंयमं भिक्षु
भाव भावयित्वा पूर्वं जिनलिंगं निर्मलं शुद्धम् ॥८१॥
वस्त्र विरहित क्षिति शयन भिक्षा असन संयम सहित ।
जिन लिंग निर्मल भाव भावित भावना परिशुद्ध है ॥८१॥
अन्वयार्थ : निर्मल शुद्ध जिनलिंग इसप्रकार है -- जहाँ पाँच प्रकार के वस्त्र का त्याग है, भूमि पर शयन है, दो प्रकार का संयम है, भिक्षा भोजन है, भावित-पूर्व अर्थात् पहिले शुद्ध आत्मा का स्वरूप पर-द्रव्य से भिन्न सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रमयी हुआ, उसे बारंबार भावना से अनुभव किया इसप्रकार जिसमें भाव है, ऐसा निर्मल अर्थात् बाह्य-मल-रहित शुद्ध अर्थात् अन्तर्मल-रहित जिनलिंग है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

यहाँ लिंग द्रव्य / भाव से दो प्रकार का है । द्रव्य तो बाह्य त्याग अपेक्षा है जिसमें पाँच प्रकार के वस्त्र का त्याग है, वे पाँच प्रकार ऐसे हैं --
  1. अंडज अर्थात् रेशम से बना,
  2. बोंडुज अर्थात् कपास से बना,
  3. रोमज अर्थात् ऊनसे बना,
  4. बल्कलज अर्थात् वृक्ष की छाल से बना,
  5. चर्मज अर्थात् मृग आदिक के चर्म से बना,
इसप्रकार पाँच प्रकार कहे । इसप्रकार नहीं जानना कि इनके सिवाय और वस्त्र ग्राह्य हैं -- ये तो उपलक्षण-मात्र कहे हैं, इसलिये सब ही वस्त्र-मात्र का त्याग जानना ।

भूमि पर सोना, बैठना इसमें काष्ठ-तृण भी गिन लेना । इन्द्रिय और मन को वश में करना, छह-काय के जीवों की रक्षा करना -- इसप्रकार दो प्रकार का संयम है । भिक्षा-भोजन करना जिसमें कृत, कारित, अनुमोदना का दोष न लगे, छियालीस दोष टले, बत्तीस अंतराय टले ऐसी विधि के अनुसार आहार करे । इसप्रकार तो बाह्य-लिंग है और पहिले कहा वैसे हो वह भाव-लिंग है, इसप्रकार दो प्रकार का शुद्ध जिन-लिंग कहा है, अन्य प्रकार श्वेताम्बरादिक कहते हैं वह जिनलिंग नहीं है ॥८१॥