
जचंदछाबडा :
लौकिक जन तथा अन्यमती कई कहते हैं कि पूजा आदिक शुभ क्रियाओं में और व्रत-क्रिया सहित है वह जिन-धर्म है, परन्तु ऐसा नहीं है । जिन-मत में जिन-भगवान ने इसप्रकार कहा है कि-पूजादिक में और व्रत-सहित होना है वह तो पुण्य है, इसमें पूजा और आदि शब्द से भक्ति, वंदना, वैयावृत्य आदिक समझना, यह तो देव-गुरु-शास्त्र के लिये होता है और उपवास आदिक व्रत हैं वह शुभ-क्रिया है, इनमें आत्मा का राग-सहित शुभ-परिणाम है उससे पुण्य-कर्म होता है इसलिये इनको पुण्य कहते हैं । इसका फल स्वर्गादिक भोगों की प्राप्ति है । मोह के क्षोभ से रहित आत्मा के परिणाम को धर्म समझिये । मिथ्यात्व तो अतत्त्वार्थ-श्रद्धान है, क्रोध-मान-अरति-शोक-भय-जुगुप्सा ये छह द्वेष-प्रकृति हैं और माया, लोभ, हास्य, रति ये चार तथा पुरुष, स्त्री, नपुंसक ये तीन विकार, ऐसी सात प्रकृति रागरूप हैं । इनके निमित्त से आत्मा का ज्ञान-दर्शन स्वभाव विकार-सहित, क्षोभरूप, चलाचल, व्याकुल होता है इसलिये इन विकारों से रहित हो तब शुद्ध दर्शन-ज्ञानरूप निश्चय हो वह आत्मा का धर्म है । इस धर्म से आत्मा के आगामी कर्म का आस्रव रुककर संवर होता है और पहिले बँधे हुए कर्मों की निर्जरा होती है । संपूर्ण निर्जरा हो जाय तब मोक्ष होता है तथा एकदेश मोह के क्षोभ की हानि होती है इसलिये शुभ-परिणाम को भी उपचार से धर्म कहते हैं और जो केवल शुभ-परिणाम ही को धर्म मानकर संतुष्ट हैं उनको धर्म की प्राप्ति नहीं है, यह जिन-मत का उपदेश है ॥८३॥ |