+ भावरहित के बाह्य परिग्रह का त्यागादिक निष्प्रयोजन -
बाहिसंगच्चाओ गिरिसरिदरिकंदराइ आवासो
सयलो णाणज्झयणो णिरत्थओ भावरहियाणं ॥89॥
बाह्यसंगत्यागः गिरिसरिद्दरीकंदरादौ आवासः
सकलं ज्ञानाध्ययनं निरर्थकं भावरहितानाम् ॥८९॥
आतमा की भावना बिन गिरि-गुफा आवास सब ।
अर ज्ञान अध्ययन आदि सब करनी निरर्थक जानिये ॥८९॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष भाव रहित हैं, शुद्ध आत्मा की भावना से रहित हैं और बाह्य आचरण से सन्तुष्ट हैं, उनके बाह्य परिग्रह का त्याग है वह निरर्थक है । गिरि (पर्वत) दरी (पर्वतकी गुफा) सरित् (नदीके पास) कंदर (पर्वतके जलसे चीरा हुआ स्थान) इत्यादि स्थानों में आवास (रहना) निरर्थक है । ध्यान करना, आसन द्वारा मन को रोकना, अध्ययन (पढ़ना) -- ये सब निरर्थक हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

बाह्य क्रिया का फल आत्मज्ञान सहित हो तो सफल हो, अन्यथा सब निरर्थक है । पुण्य का फल हो तो भी संसार का ही कारण है, मोक्षफल नहीं है ॥८९॥