
जचंदछाबडा :
प्रथम जीव-तत्त्व की भावना तो सामान्य जीव दर्शन-ज्ञानमयी चेतना-स्वरूप है, उसकी भावना करना । पीछे ऐसा मैं हूँ इसप्रकार आत्म-तत्त्व की भावना करना । दूसरा अजीव-तत्त्व है सो सामान्य अचेतन जड़ है, यह पाँच भेदरूप पुद्रल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल हैं इनका विचार करना । पीछे भावना करना कि -- ये हैं, वह मैं नहीं हूँ । तीसरा आस्रव-तत्त्व है वह जीव-पुद्गल के संयोग-जनित भाव है, इनमें अनादि कर्म-सन्ब्ध से जीव के भाव (भाव-आस्रव) तो राग-द्वेष-मोह हैं और अजीव पुद्गल के भाव-कर्म के उदयरूप मिथ्यात्व, अविरत, कषाय और योग द्रव्यास्रव है । इनकी भावना करना कि ये (--असद्भूत व्यवहारनय अपेक्षा) मुझे होते हैं, (अशुद्ध निश्चयनय से) राग-द्वेष-मोह भाव मेरे हैं, इनसे कर्मों का बन्ध होता है, उससे संसार होता है इसलिये इनका कर्त्ता न होना (स्व में अपने ज्ञाता रहना) । चौथा बन्ध-तत्त्व है वह मैं राग-द्वेष-मोहरूप परिणमन करता हूँ वह तो मेरी चेतना का विभाव है, इससे जो बंधते हैं वे पुद्गल हैं, कर्म पुद्गल है, कर्म पुद्गल ज्ञानावरण आदि आठ प्रकार होकर बंधता है, वे स्वभाव-प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशरूप चार प्रकार होकर बँधते हैं, वे मेरे विभाव तथा पुद्गल कर्म सब हेय हैं, संसार के कारण हैं, मुझे रागद्वेष मोहरूप नहीं होना है, इसप्रकार भावना करना । पाँचवाँ संवर-तत्त्व है वह राग-द्वेष-मोहरूप जीव के विभाव हैं, उनका न होना और दर्शन-ज्ञानरूप चेतनाभाव स्थिर होना यह संवर है, वह अपना भाव है और इसीसे पुद्गल-कर्म-जनित भ्रमण मिटता है । इसप्रकार इन पाँच तत्त्वों की भावना करने में आत्म-तत्त्व की भावना प्रधान है, उससे कर्म की निर्जरा होकर मोक्ष होता है । आत्मा का भाव अनुक्रम से शुद्ध होना यह तो निर्जरा-तत्त्व हुआ और सब कर्मों का अभाव होना वह मोक्ष-तत्त्व हुआ । इसप्रकार सात तत्त्वों की भावना करना । इसलिये आत्म-तत्त्व का विशेषण किया कि आत्म-तत्त्व कैसा है -- धर्म, अर्थ, काम, इस त्रिवर्ग का अभाव करता है । इसकी भावना से त्रिवर्ग से भिन्न चौथा पुरुषार्थ मोक्ष है वह होता है । यह आत्मा ज्ञान-दर्शनमयी चेतना-स्वरूप अनादिनिधन है, इसका आदि भी नहीं और निधन (नाश) भी नहीं है । भावना नाम बारबार अभ्यास करने, चिन्तन करने का है वह मन-वचन-काय से आप करना तथा दूसरे को कराना और करानेवाले को भला जानना -- ऐसे त्रिकरण शुद्ध करके भावना करना । माया-निदान शल्य नहीं रखना, ख्याति, लाभ, पूजाका आशय न रखना । इसप्रकार से ततत्व की भावना करने से भाव शुद्ध होते हैं । स्त्री आदि पदार्थों पर से भेद-ज्ञानी का विचार । इसका उदाहरण इसप्रकार है कि -- जब स्त्री आदि इन्द्रियगोचर हों (दिखाई दें) तब उनके विषय में तत्त्व-विचार करना कि यह स्त्री है वह क्या है ? जीव नामक तत्त्व की एक पर्याय है, इसका शरीर है वह तो पुद्गल-तत्त्व की पर्याय है, यह हाव-भाव चेष्टा करती है, वह इस जीव के विकार हुआ है यह आस्रव-तत्त्व है और बाह्य चेष्टा पुद्गल की है, इस विकार से इस स्त्री की आत्मा के कर्म का बन्ध होता है । यह विकार इसके न हो तो आस्रव बन्ध इसके न हों । कदाचित् मैं भी इसको देखकर विकाररूप परिणमन करूँ तो मेरे भी आस्रव बन्ध हों । इसलिये मुझे विकाररूप न होना यह संवर-तत्त्व है । बन सके तो कुछ उपदेश देकर इसका विकार दूर करूँ (ऐसा विकल्प राग है,) वह राग भी करने योग्य नहीं है -- स्व-सन्मुख ज्ञातापने में धैर्य रखना योग्य है । इसप्रकार तत्त्व की भावना से अपना भाव अशुद्ध नहीं होता है, इसलिये जो दृष्टिगोचर पदार्थ हों उनमें इसप्रकार तत्त्व की भावना रखना, यह तत्त्व की भावना का उपदेश है ॥११४॥ |