+ यह ध्यान भावलिंगी मुनियों का मोक्ष करता है -
जे के वि दव्वसवणा इंदियसुहआउला ण छिंदंति
छिंदंति भावसवणा झाणकुढारेहिं भवरुक्खं ॥122॥
ये केडपि द्रव्यश्रमणा इन्द्रियसुखाकुलाः न छिन्दन्ति
छिन्दन्ति भावश्रमणाः ध्यानकुठारैः भववृक्षम् ॥१२२॥
इन्द्रिय-सुखाकुल द्रव्यलिंगी कर्मतरु नहिं काटते ।
पर भावलिंगी भवतरु को ध्यान करवत काटते ॥१२२॥
अन्वयार्थ : कई द्रव्य-लिंगी श्रमण हैं, वे तो इन्द्रिय-सुख में व्याकुल हैं, उनके यह धर्म-शुक्ल-ध्यान नहीं होता है । वे तो संसाररूपी वृक्ष को काटने में समर्थ नहीं हैं, और जो भाव-लिंगी श्रमण हैं, वे ध्यानरूपी कुल्हाड़े से संसाररूपी वृक्ष को काटते हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जो मुनि द्रव्य-लिंग तो धारण करते हैं, परन्तु उसको परमार्थ-सुख का अनुभव नहीं हुआ है, इसलिये इहलोक-परलोक में इन्द्रियों के सुख ही को चाहते हैं, तपश्चरणादिक भी इसी अभिलाषा से करते हैं उनके धर्म-शुक्ल ध्यान कैसे हो ? अर्थात् नहीं होता है । जिनने परमार्थ सुख का आस्वाद लिया उनको इन्द्रिय-सुख दुःख ही है ऐसा स्पष्ट भासित हुआ है, अतः परमार्थ-सुख का उपाय धर्म-शुक्ल ध्यान है उसको करके वे संसार का अभाव करते हैं, इसलिए भाव-लिंगी होकर ध्यान का अभ्यास करना चाहिये ॥१२२॥