+ एकान्त मिथ्यात्व के त्याग की प्रेरणा -
मिच्छत्तछण्णदिट्ठी दुद्धीए दुम्मएहिं दोसेहिं
धम्मं जिणपण्णत्तं अभव्यजीवो ण रोचेदि ॥139॥
मिथ्यात्वछन्नदृष्टिः दुर्धिया दुर्मतैः दोषैः
धर्मं जिनप्रज्ञप्तं अभव्यजीवः न रोचयति ॥१३९॥
मिथ्यात्व से आछन्नबुद्धि अभव्य दुर्मति दोष से ।
जिनवरकथित जिनधर्म की श्रद्धा कभी करता नहीं ॥१३९॥
अन्वयार्थ : दुर्मत जो सर्वथा एकान्त मत, उनसे प्ररूपित अन्यमत, वे ही हुए दोष उनके द्वारा अपनी दुर्बुद्धि से (मिथ्यात्वसे) आच्छादित है बुद्धि जिसकी, ऐसा अभव्य-जीव है उसे जिनप्रणीत धर्म नहीं रुचता है, वह उसकी श्रद्धा नहीं करता है, उसमें रुचि नहीं करता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

मिथ्यात्व के उपदेश से अपनी दुर्बुद्धि द्वारा जिसके मिथ्यादृष्टि है उसको जिन-धर्म नहीं रुचता है, तब ज्ञात होता है कि ये अभव्य-जीव के भाव हैं । यथार्थ अभव्य-जीव को तो सर्वज्ञ जानते हैं, परन्तु ये अभव्य जीव के चिह्न हैं, इनसे परीक्षा द्वारा जाना जाता है ॥१३९॥