
जह तारायणसहियं ससहरबिंबं खमंडले विमले
भाविय तववयविमलं जिणलिंगं दंसणविसुद्धं ॥146॥
यथा तारागणसहितं शशधरबिंबं खमंडले विमले
भावतं तपोव्रतविमलं जिनलिंगं दर्शनविशुद्धम् ॥१४६॥
चन्द्र तारागण सहित ही लसे नभ में जिसतरह ।
व्रत तप तथा दर्शन सहित जिनलिंग शोभे उसतरह ॥१४६॥
अन्वयार्थ : जैसे निर्मल आकाशमंडल में ताराओं के समूहसहित चन्द्रमा का बिंब शोभा पाता है, वैसे ही जिनशासन में दर्शन से विशुद्ध और भावित किये हुए तप तथा व्रतों में निर्मल जिनलिंग है सो शोभा पाता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
जिनलिंग अर्थात् 'निर्ग्रंथ मुनिभेष' यद्यपि तप--व्रतसहित निर्मल है, तो भी सम्यग्दर्शनके बिना शोभा नहीं पाता है । इसके होने पर ही अत्यन्त शोभायमान होता है ॥१४६॥
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