+ भाव सहित सम्यग्दृष्टि हैं वे ही सकल शील संयमादि गुणों से संयुक्त हैं, अन्य नहीं -
ते च्चिय भणामि हं जे सयलकलासीलसंजमगुणेहिं
बहुदोसाणावासो सुमलिणचित्तो ण सावयसमो सो ॥155॥
तानेव च भणामि ये सकलकलाशीलसंयमगुणैः
बहुदोषाणामावासः सुमलिनचित्तः न श्रावकसमः सः ॥१५५॥
सब शील संयम गुण सहित जो उन्हें हम मुनिवर कहें ।
बहु दोष के आवास जो हैं अरे श्रावक सम न वे ॥१५५॥
अन्वयार्थ : पूर्वोक्त भावसहित सम्यग्दृष्टि पुरुष हैं और शील संयम गुणों से सकल कला अर्थात् संपूर्ण कलावान होते हैं, उनही को हम मुनि कहते हैं । जो सम्यग्दृष्टि नहीं है, मलिनचित्तसहित मिथ्यादृष्टि है और बहुत दोषों का आवास (स्थान) है वह तो भेष धारण करता है तो भी श्रावक के समान भी नहीं है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जो सम्यग्दृष्टि है और शील (--उत्तरगुण) तथा संयम (--मूलगुण) सहित है वह मुनि है । जो मिथ्यादृष्टि है अर्थात् जिसका चित्त मिथ्यात्व से मलिन है और जिसमें क्रोधादि विकाररूप बहुत दोष पाये जाते हैं, वह तो मुनि का भेष धारण करता है तो भी श्रावकके समान भी नहीं है, श्रावक सम्यग्दृष्टि हो और गृहस्थाचार के पाप सहित हो तो भी उसके बराबर वह--केवल भेषमात्र को धारण करनेवाला मुनि-नहीं है, ऐसा आचार्यने कहा है ॥१५५॥