
जं जाणिऊण जोई जोअत्थो जोइऊण अणवरयं
अव्वाबाहमणंतं अणोवमं लहइ णिव्वाणं ॥3॥
यत् ज्ञात्वा योगी योगस्थः दृष्ट्वा अनतवरतम्
अव्याबाधमनंतं अनुपमं लभते निर्वाणम् ॥३॥
योगस्थ योगीजन अनवरत अरे ! जिसको जान कर ।
अनंत अव्याबाध अनुपम मोक्ष की प्राप्ति करें ॥३॥
अन्वयार्थ : [जं] उसे [जाणिऊण] जानकर [जोई] योगी [जोअत्थो] योग में स्थित होकर [अणवरयं] निरन्तर उस परमात्मा को [जोइऊण] अनुभवगोचर करके [अव्वाबाहमणंतं] अव्याबाध अनंत [अणोवमं] अनुपम [णिव्वाणं] निर्वाण को [लहइ] प्राप्त होता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
आचार्य कहते हैं कि ऐसे परमात्मा को आगे कहेंगे जिसके ध्यान में मुनि निरन्तर अनुभव करके केवलज्ञान प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त करते हैं । यहाँ यह तात्पर्य है कि परमात्मा के ध्यान से मोक्ष होता है ॥३॥
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