
बहिरत्थे फुरियमणो इंदियदारेण णियसरूववचुओ
णियदेहं अप्पाणं अज्झवसदि मूढदिट्ठीओ ॥8॥
बहिरर्थे स्फुरितमनाः इन्द्रियद्वारेण निजस्वरूपच्युतः
निजदेहं आत्मानं अध्यवस्यति मूढदृष्टिस्तु ॥८॥
निजरूप से च्युत बाह्य में स्फुरितबुद्धि जीव यह ।
देहादि में अपनत्व कर बहिरात्मपन धारण करे ॥८॥
अन्वयार्थ : [बहिरत्थे] बाह्य पदार्थ [फुरियमणो] स्फुरित मनवाला, [इंदियदारेण] इन्द्रियों के द्वार से [णियसरूववचुओ] अपने स्वरूप से च्युत, [णियदेहं] अपने देह को ही [अप्पाणं] आत्मा [अज्झवसदि] जानता है / निश्चय करता है, वह [मूढदिट्ठीओ] मिथ्यादृष्टि बहिरात्मा है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
ऐसा बहिरात्मा का भाव है उसको छोड़ना ॥८॥
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