+ देह में निर्मम निर्वाण को पाता है -
जो देहे णिरवेक्खो णिद्दंदो णिम्ममो णिरारंभो
आदासहावे सुरतो जोई सो लहइ णिव्वाणं ॥12॥
यः देहः निरपेक्षः निर्द्वन्दः निर्ममः निरारंभः
आत्मस्वभावे सुरत: योगी स लभते निर्वाणम् ॥१२॥
जो देह से निरपेक्ष निर्म निरारंभी योगिजन ।
निर्द्वन्द रत निजभाव में वे ही श्रमण मुक्ति वरें ॥१२॥
अन्वयार्थ : जो [देहे] देह में [णिरवेक्खो] निरपेक्ष (उदासीन) है, [णिद्दंदो] निर्द्वंद्व (राग-द्वेषरूप इष्ट-अनिष्ट मान्यता से रहित) है, [णिम्ममो] निर्ममत्त्व (देहादिक में 'यह मेरा' ऐसी बुद्धि से रहित) है, [णिरारंभो] आरंभ (पाप-कार्यों) से रहित है और [आदासहावे] आत्म-स्वभाव में [सुरतः] भली-प्रकार से लीन है, [जोई सो] वह मुनि [लहइ णिव्वाणं] निर्वाण को प्राप्त करता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जो बहिरात्मा के भाव को छोड़कर अन्तरात्मा बनकर परमात्मा में लीन होता है वह मोक्ष प्राप्त करता है । यह उपदेश बताया है ॥१२॥